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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
हिन्दी पत्रकारिता : समाज का प्रतिबिम्ब एवं साहित्य संवाहिका
Authors
डॉ. श्रीमती. के. चंद्रा
Abstract
अनेकानेक भाषाओं के साथ-साथ हिंदी भाषा की भी सर्वागीन प्रगति-उन्नति हो रही है ।  लेखकों एवं प्रकाशकों, विविधवर्गी लेख आदि सभी क्षेत्रों में बढ़ोत्तरी हुई है। हिंदी लेखन की परिधि एवं व्यापाकता में अपार वृद्धि हुई है । हिंदी का जो रूप आज राजभाषा, राष्ट्रभाषा, और संपर्क भाषा के रूप में स्थापित है वह खड़ीबोली से विकसित हुई है। वस्तुत: हिंदी शब्द खड़ीबोली के पर्याय रूप में प्रयुक्त होता है। हिंदी पत्रकारिता की विशेषताओं में समाचार लेखन जो विभिन्न विषयों से जुड़कर लिखा जाता है, जो उसकी भाषा का स्थापित स्वरुप है। इसी तरह अन्य विशेषताएं, रिपोर्टिं, प्रेस सम्मेलन, निविदा यानि टेंडर, साक्षात्कार एवं परिचर्चा, विविध-विषयक समीक्षा, विज्ञापन आदि की भाषा शैली का भी स्थापित स्वरुप है । साहित्य की विभिन्न विधाओं जैसे पद्य साहित्य में कविता, गीत आदि एवं गद्य साहित्य में कथा, निबंध, आलोचना,  संस्मरण, रिपोतार्ज, डायरी, जीवानी आदि पत्रकारिता के माध्यम से ही हिन्दी के विकास में योगदान मिला है । आज पत्रकारिता संप्रेषण का सामाजिक माध्यम बन चुकी है  । पत्रकारिता एक ओर समाज के प्रत्येक स्पंदन का माप है , तो दूसरी ओर विकृतियों का प्रस्तोता आदर्श और सुधार का सहज उपचार एवं मानवीय संवेदना का स्त्रोत भी है  । पत्रकारिता समाज में लोगों का प्राणतत्व है जो समयानुसार उनमें नई उमंग जगाता रहता है  । पत्र – पत्रिकाओं के माध्यम से अहिंदी क्षेत्रों के पत्रकारों और साहित्यकारों ने भी अपना दायित्व अच्छे से निभाया है  । तत्पश्चात के दशकों में व्याप्त वैश्वीकरण एवं उदारीकरण के कारण हिन्दी पत्रकारिता में उसके आकलन की क्षमता में बहुत ही तेजी से वृद्धि हुई । आज भी हिन्दी पत्रकारिता तमाम परिवर्तनों के बावजूद जन-चेतना के यथार्थ से विमुख नहीं हुई है । 
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Pages:22-23
How to cite this article:
डॉ. श्रीमती. के. चंद्रा "हिन्दी पत्रकारिता : समाज का प्रतिबिम्ब एवं साहित्य संवाहिका". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 22-23
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