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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 12, ISSUE 2 (2026)
भोजपुरी लोकसाहित्य के शेक्सपियरः नट सम्राट भिखारी ठाकुर
Authors
डी0 सी0 पाण्डेय
Abstract
मनुष्य के बहुआयामी जीवनवृत्त की तरह ही लाोकसाहित्य की परिधि भी असीमित फलक लिए हुए है। सामान्यतया मौखिक परम्परा द्वारा पीढ़ी दर पीढ़ी कण्ठान्तरित होकर हमारी धमनियों में लोकसाहित्य जीवन के विभिन्न रंगों का समावेश हमारे सम्मुख प्रस्तुत करता है। आज देश में कतिपय क्षेत्रों में लोकसाहित्य को लिखित रूप में संग्रहीत करने का प्रचलन देखने में आता है। भारतीय साहित्य के ‘निश्छल‘ एवं विकारहीन सृजन लोकसाहित्य मात्र आदिम, ग्रामीण, अशिक्षित, अर्द्धशिक्षित, अविकसित संस्कृति समुदाय तक सीमित न होकर परिष्कृत जीवन व्यतीत करने वाले के जीवन का भी स्नेहांश के रूप में भी देखा जा सकता है। लोकसाहित्य की न केवल समृद्धता वरन् विविधता भारतीय  साहित्यिक परिदृश्य की अनुपम निधि है जिनमें हमारे लोककंठों की मौलिक जीवन शैली की सौंधी सुगन्ध को सहजता के साथ अनुभूत किया जा सकता है। लोक का व्यापक सन्दर्भ में अर्थ सर्वसाधारण जन से है। तीज-त्योहार, रीति-परम्परा का पालन करते समय नगरीय जनों में भी इसकी आंशिक झलक तब भी देखी जा सकती है। इसमें असहमति नहीं हो सकती है कि आदिम जातियों में इसकी अभिव्यक्ति अपेक्षाकृत अधिक पाई जाती है। सरल, सहज, सरस, अकृत्रिम रूप में लोक साहित्य सीमाओं के बन्धनों से मुक्त स्वछन्द नवगगन में कुंलाचे मारता उड़ान भरता दिखता है। परिवर्तन की आँधी के मध्य लोकसाहित्य में भी बदलाव के बीजांकुर परम्पराओं व विश्वासों के बीच झलक पाता है। भारतवर्ष के विविध प्रान्तों में लोकसाहित्य विविध विधाओं के रूप में आज भी जीवन्त देखा जा सकता है। जैसे अखिल भारतीय स्तर पर विविध प्रान्तों में प्रचलित   कुछ प्रमुख लोकनाट्यों का परिचय मात्र इस प्रकार है
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Pages:66-69
How to cite this article:
डी0 सी0 पाण्डेय "भोजपुरी लोकसाहित्य के शेक्सपियरः नट सम्राट भिखारी ठाकुर". International Journal of Hindi Research, Vol 12, Issue 2, 2026, Pages 66-69
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