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VOL. 2, ISSUE 4 (2016)
नारी अस्मिता का परिचायक उपन्यास ‘‘बेतवा बहती रही’’
Authors
डाॅ. निकेता सिंह
Abstract
वर्तमान समय में जब चारों ओर स्त्री-अस्मिता पर विचार-विमर्ष हो रहा है, ऐसी स्थिति में हमारे तथाकथित सभ्य समाज के सामने एक बहुत बड़ा प्रष्न सामने खड़ा हो गया है कि हमारे समाज में स्त्री का स्थान क्या है ? इस पुरुश सŸाात्मक समाज ने जो आरम्भ से ही स्त्रियों को दबा कर रखा था, आज आधुनिक सोच और षिक्षा के कारण वे अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो गयी है एवं अपने अधिकारों की मांग करते हुए इस पुरुश प्रधान समाज को चुनौति दे रही है। आज भी आधुनिकता के इस दौर में हमारे देष में स्त्रियों की हालात ठीक नहीं है। षहरों में स्थिति थोड़ बेहतर है परन्तु गाँव में स्त्रियों की स्थिति दयनीय और भयावह है। स्त्रियों की इसी दयनीय और भयावह स्थिति को मैत्रेयी पुश्पा जी का उपन्यास ‘बेतवा बहती रही’ बखूबी उजागर करती है। प्रस्तुत उपन्यास की प्रमुख पात्र ‘उर्वषी’ द्वारा मैत्रेयी पुश्पा जी ने पुरुश प्रधान समाज का और नारी संघर्श और अस्मिता का जो चित्र हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है, वह हमे सोचने को मजबूर करती है कि वर्तमान भारत में नारियों की स्थिति आज भी इतना भयावह हो सकती है। खासकर पुरुश प्रधान समाज का ये सोच की बेटियों का तो अपना कोई घर ही नहीं। बेटियों को पराया धन समझा गया है। खासकर तो लोग नारी को भोग की वस्तु समझने लगे हैं। नारियों का ना तो मायका अपना होता है और ना ससुराल। इसलिए पति के मृत्यु के बाद ससुराल में ‘उर्वषी’ का कोई स्थान नहीं रहता है। ‘उर्वषी’ का भाई उसे पैसे के लालच में ‘उर्वषी’ की ही बचपन की सहेली के पिता को सौप देता हैं। ‘उर्वषी’ के दुःखों का अन्त उसके मृत्यु से होती है और एक प्रष्न हमारे सामने छोड़ जाती है कि क्या हमारे समाज में स्त्रियों को अपने आत्म सम्मान और अधिकारों के साथ जीवन जीने का कोई हक है या नहीं ?
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Pages:29-31
How to cite this article:
डाॅ. निकेता सिंह "नारी अस्मिता का परिचायक उपन्यास ‘‘बेतवा बहती रही’’". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 4, 2016, Pages 29-31
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