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VOL. 2, ISSUE 5 (2016)
प्रसाद के काव्य: आरम्भिक रचनाओं में सौन्दर्य एवं दर्शनें
Authors
संगीता पाण्डेय
Abstract
प्रसाद जी ने आनन्दवाद की प्रतिष्ठा करके भौतिक संघर्ष से ग्रस्त लोगों को सुखानुभूति कराया है। प्रसाद जी की अन्र्तमान्यता है कि सौन्दर्य और दर्शन मानव के लिए आनन्द का स्वरूप प्रसस्त किया है। उनकी दृष्टि में "सौन्दर्य और दर्शन" प्राणिलोक का मूल चिन्तन धारा है जिसका परिणाम आनन्दमयी मानवतावाद की प्रतिष्ठा कहा जा सकता है। प्रसाद के करुणालय की कविताओं में प्रकृति, भाव, कथा, सत्य, सौन्दर्य के साथ दार्शनिक बोध की दृष्टि से कवि ने अपने आधारभूत अद्वैत दर्शन सिद्धान्त की प्रतिष्ठा की है। उनका आनन्दवाद मानवोचित धारणाओं से सम्बन्धित है। प्रसाद जी की इस काव्यात्मक प्रवृत्ति से प्रभावित होकर मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचती हूँ कि उनकी रचना ‘‘महाराणा का महत्व’’ में राष्ट्रवाद, मानवतावाद, कर्म की प्रधानता और विश्व मंगल की कामना प्रबल थी। भारत भूमि सदैव से ऐसे वीर सम्राट को जन्म देती रही है जिसमें प्राणि मात्र के प्रति दया-भाव और पराक्रम में सुयश के दर्शन होते हैं। प्रसाद जी ने अपनी रचना धर्मिता के द्वारा जनता के हृदय में आत्म विश्वास स्वाभिमान का भाव जगाया है। साथ ही मानवमन की बुराइयों को दूर कर उज्ज्वल भविष्य के निर्माण के लिए सौन्दर्य और दर्शन की प्रतिष्ठा कर काव्य मार्ग प्रशस्त किया।
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Pages:80-83
How to cite this article:
संगीता पाण्डेय "प्रसाद के काव्य: आरम्भिक रचनाओं में सौन्दर्य एवं दर्शनें". International Journal of Hindi Research, Vol 2, Issue 5, 2016, Pages 80-83
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