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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 3, ISSUE 2 (2017)
पं. लखमीचंद के सांगों में लोक-जीवन
Authors
डाॅ. पूनम काजल
Abstract
कबीर की ही भाँति ‘मसि कागद छुओ नहिं कलम गह्यो नहिं हाथ’ को सार्थक करने वाले हरियाणवी साहित्यकार एवं रागनी के वर्तमान स्वरूप के जन्मदाता पं. लखमीचंद जी ने हरियाणवी सांग विधा को परम्परागत रूढ़िगत बन्धनों से मुक्त कर एक नई दिशा दी। इनके सांगों में लोकमानस की भावनाएँ, करूणा और व्यथा पूर्ण व्यापकता के साथ दिखाई देती हैं। उनका व्यापक रचना-संसार इतिहास, पुराण एवं लोक से कथात्मक आधार ग्रहण करके भी हरियाणवी जन-जीवन से गहरे से जुड़ा हुआ है।
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Pages:30-33
How to cite this article:
डाॅ. पूनम काजल "पं. लखमीचंद के सांगों में लोक-जीवन". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 2, 2017, Pages 30-33
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