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VOL. 3, ISSUE 5 (2017)
21 वीं सदी में हिन्दी का समसामयिक परिदृश्य : एक विमर्श
Authors
राजकुमार लहरे
Abstract
भाषा वाणी का परिधान तथा ध्वनि का प्रतीक है, जिसे मन पहनता है। भाषा मूलतः विचार विनिमय के साधन है। भाषा से ही व्यक्ति के मन का संस्कृत/असंस्कृत होने का पता चलता है। जिसे भारतेन्दु जी ने सर्वांगीण विकास का मूल कहा- ’निज भाषा उन्नति अहै सब उन्नति को मूल’।1. तब हिन्दी प्रदेश तथा वहाॅ के भाषायी संस्कृति, विचार विनिमय व संर्वांगीण विकास के मुख्य धारा का सम्यक् परिज्ञान समसामयिक संदर्भ में और अधिक अपरिहार्य हो जाता है। भाषा का मूल उद्देश्य व्यक्तिगत/सामुहिक भाव, विचारों को लक्ष्य तक पूर्णतः सम्प्रेषित करना है। इसीलिए हिन्दी भाषा का विकासात्मक स्तर में विविध रूप देखने को मिलता है। तथा हिन्दी भाषा समय के अनुरूप बदलाव को स्वीकार करता हुआ स्वयं को उसी रूप में ढालता गया है।
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Pages:68-71
How to cite this article:
राजकुमार लहरे "21 वीं सदी में हिन्दी का समसामयिक परिदृश्य : एक विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 3, Issue 5, 2017, Pages 68-71
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