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VOL. 4, ISSUE 6 (2018)
श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ
Authors
आशा रानी वर्मा
Abstract
यज्ञ वैदिक काल से ही भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग रहा है। श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ के व्यापक अर्थ पर विचार किया गया है। गीता के नवें अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं को ही यज्ञ रूप कहते हैं। चतुर्थ अध्याय में ब्रह्म यज्ञ, देव यज्ञ, इन्द्रियसंयमरूपी यज्ञ अन्तःकरणसंयमरूपी यज्ञ, द्रव्य यज्ञ, तप यज्ञ, स्वाध्यायरूपी ज्ञान यज्ञ आदि के बारे में बताया गया है। यज्ञ से सृष्टि क्रम चलता है। गीता के अन्तिम अध्याय में भगवान कहते हैं कि यज्ञ, दान और तप कर्म कथमपि त्याज्य नहीं हैं। देवता प्रदत्त द्रव्यों का समस्त प्राणि संसार के लिए त्याग ही यज्ञ है। इन्द्रियरूपी अग्नि में विषयरूपी द्रव्यों की आहुति देने वाले पुरूष के लिए सुख रात्रि के समान के हो जाते हैं। इस प्रकार यज्ञ साधना करने वाला अन्त में परमात्म प्राप्ति द्वारा परम पुरूषार्थ को प्राप्त कर लेता है। यज्ञ से मानव का आत्मकल्याण तो होता ही है, समाज का भी कल्याण यज्ञमय जीवन में निहित है।
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Pages:50-51
How to cite this article:
आशा रानी वर्मा "श्रीमद्भगवद्गीता में यज्ञ". International Journal of Hindi Research, Vol 4, Issue 6, 2018, Pages 50-51
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