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VOL. 5, ISSUE 2 (2019)
गोस्वामी तुलसीदास का अभिप्रेत सामाजिक संदर्भ
Authors
जितेन्द्र कुमार गिरि
Abstract
लोकचेतना के सदंर्भ में सार्वकालिक चिंतन दृष्टि से समृद्ध गोस्वामी तुलसीदास हिन्दी के उन महान कवियों में अग्रणी हैं जिन्होंने पहली बार साहित्य और समाज को परस्पर अनुपूरक मानकर साहित्य की सर्जना की, और इसमें भी उन्होंने काव्य और लोकमंगल की संपृक्तता को साहित्य का एकमात्र प्रयोजन माना। उनका सम्पूर्ण काव्य इसी लोक कल्याण के इर्द-गिर्द विचरण करता नज़र आता है। उनकी सामाजिक एवं धार्मिक दृष्टि का आयाम अत्यंत व्यापक था, उनसे जीवन का कोई भी कोना अछूता नहीं था फिर चाहे वह भक्ति, ज्ञान और कर्म का दर्शन रहा हो अथवा सामाजिक संबंधों का आदर्श, उन्होंने सभी का शुद्धीकरण करके उनकी महत्ता को पुर्नस्थापित किया जिससे वे पुनः उपयोगी बन सकंे। इसी तरह से निष्क्रिय एवं चेतना शून्य जनमानस की करुणा को संवेदना और स्वाभिमान से ओत-प्रोत कर उनको पुनर्जाग्रत किया। अपने इस साध्य की प्राप्ति हेतु उन्होंने ‘राम’ और रामकाव्य को साधन के रूप में प्रयुक्त किया तथा इन दोनों को लोकप्रिय बनाने के उद्देश्य से उन सभी उपकरणों को अजमाया, जो लोक में प्रचलित थे। भक्तिकाल तथा भक्ति आन्दोलन के सबसे सशक्त हस्ताक्षर तुलसीदास जी को यद्यपि जीवन की विविध सरणियों का गहन ज्ञान था। परन्तु उनके द्वारा सामाजिक, सांस्कृतिक एवं धार्मिक जीवन का चित्रण अत्यधिक मनोयोग से किया गया। फिर भी धर्म, दर्शन, काव्य, कला और पौराणिकता आदि अनेक दृष्टियों से तुलसी काव्य महत्वपूर्ण है ही, साथ ही लोक तत्वों के समावेश एवं लोकजीवन के चित्रण में भी उसका महत्व किसी प्रकार से कम नहीं है। उनका साहित्यिक प्रदेय समस्त भक्तिकाल पर भारी है। आदर्शों और मूल्यों की दृष्टि से भक्तिकाल को उसकी पराकाष्ठा पर पहुँचाकर उसे ‘स्वर्णयुग’ की संज्ञा दिलाने में गोस्वामी जी का अतुलनीय योगदान रहा है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
जितेन्द्र कुमार गिरि "गोस्वामी तुलसीदास का अभिप्रेत सामाजिक संदर्भ". International Journal of Hindi Research, Vol 5, Issue 2, 2019, Pages 13-15
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