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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 6, ISSUE 1 (2020)
पर्यावरणीय संकट एवं मानव विकास
Authors
विवेक कुमार पाण्डेय
Abstract
आज पृथ्वी का अंधाधुंध दोहन इस कदर बढ़ गया है कि मानव जीवन ही संकट के दलदल में फँस गया है । सभ्यता एवं संस्कृति के विकास के साथ मानव ने औद्योगिक क्षेत्र में भी खासी प्रगति की है । इसके लिए मानव ने प्रकृति पर नियंत्रण करना प्रारंभ किया, उसे अपना नियंता समझने के बजाय दास समझने लगा । जीवन को ज्यादा-से-ज्यादा आरामतलब बनाने के लिए प्राकृतिक संसाधनों का ज्यादा-से-ज्यादा दोहन किया जाने लगा । उसकी विलासितापूर्ण जीवनशैली ने प्राकृतिक हवा, पानी, मिट्टी आदि को दूषित कर दिया है, परिणामस्वरूप मानव जीवन संकट के बादल छाने लगे । मनुष्य अपनी जरूरत के हिसाब से नहीं, बल्कि उपभोक्तावादी संस्कृति, बाजारवादी अर्थव्यवस्था, नव-उदारवादी संस्कृति की चपेट में आकर प्रकृति के दोहन में जुटा हुआ है । इसी संस्कृति के परिणामस्वरूप औद्योगिकीकरण, मशीनीकरण की शुरुआत होती है, जो प्रकृति में असंतुलन को जन्म दे रही है । आज हम प्रकृति के साथ लुटेरे जैसा व्यवहार कर रहें हैं, जैसे वह कोई पराई वस्तु हो । परन्तु इसके परिणाम कितने भयावह होंगे इसका अंदाजा लगाना अभी मुश्किल है, शायद इंसान का ध्यान उस तरफ कम जा रहा है ।
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Pages:80-82
How to cite this article:
विवेक कुमार पाण्डेय "पर्यावरणीय संकट एवं मानव विकास". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 1, 2020, Pages 80-82
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