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VOL. 6, ISSUE 3 (2020)
भारत के परिप्रेक्ष्य में बहुभाषिकता: एक अभिशाप या वरदान ?
Authors
मो० फैसल
Abstract
भारतीय समाज एक ऐसा बहुभाषिक समाज है, जहां प्राचीन काल से ही समाज में बहुत सारी भाषाओं का उपयोग होता आ रहा है। अथर्ववेद में कहा भी गया है कि यहां बहुत सारी भाषाएं बोलने वाले, नाना धर्मो का पालन करने वाले बहुत से लोग रहते है। यही विशेषता भारत को दुनिया में एक विशिष्ट और उदार राष्ट्र बनाती है परन्तु यह भी सत्य है कि विश्व में अनेक ऐसे देश हैं जिन्होंने निज भाषाओं को आधार बनाकर ही अपने देश व समाज का विकास किया है और जो अपनी भाषा पर अभिमान करके एकभाषावाद को प्रोत्साहित करते हैं। आमतौर से, भारत जैसे विकासशील देशों की बहुभाषिकता को विकसित देशों के नियमानुसार एक समस्या के रूप में देखा जाता है तथा यह तर्क दिया जाता है कि बहुत सारी भाषाएं, बहुत से धर्म, जातियां देश की एकता व अखंडता को तोड़ती हैं। ऐसे में भारत जैसे देश में, जहां विभिन्न धर्मों, संस्कृतियों, भाषा-बोलियों से संबंधित लोग निवास करते हैं, यहां भाषा की विविधता एक समस्या के रूप में प्रतीत होती है, विशेषकर जब बात राष्ट्रभाषा व शिक्षा के माध्यम भाषा की आती है। अतः प्रस्तुत शोध आलेख में इस बात को जानने का प्रयास किया गया है कि क्या वास्तव में भारतीय परिप्रेक्ष्य में भाषाई विविधता/बहुभाषिकता एक समस्या के रूप में उभरकर हमारे सामने आती है या इसको वर्तमान भूमंडलीकरण के युग में एक संसाधन के रूप में देखा जाना चाहिए ?
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Pages:45-50
How to cite this article:
मो० फैसल "भारत के परिप्रेक्ष्य में बहुभाषिकता: एक अभिशाप या वरदान ?". International Journal of Hindi Research, Vol 6, Issue 3, 2020, Pages 45-50
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