International Journal of Hindi Research

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Vol. 7, Issue 1 (2021)

मधु कांकारिया के कथा साहित्य में पारिवारिक युगबोध


पंडित शिशुपाल गाँधी

आज के युग में यांत्रिक प्रोद्योगिकी का विकास इतना बढ़ गया है कि मनुष्य जाति की सृजनात्मक शक्ति तकनीकी बोझ से दब चुकी है, आज के युवा वर्ग को विज्ञान ने काव्य और साहित्य कला को निरूत्साहित्य किया है, धन का एकत्रीकरण, सुख – सुविधाओं की बहुतायत व्यापार बन चुका है । मधु कांकरिया 20वीं शताब्दी के मध्य से और इक्कीसवीं शताब्दी के प्रारंभिक दौर के समाज में फैली उँच – नीच की जड़ों पर भी निगाह डालती हैं और उनपर तीखा प्रहार करती है । लेखिका ऐसे लागों की मानसिकता पर तीखा वार करती है । ऐसे में इनकी कथा साहित्य के अंतर्गत ‘मधु कांकरिया के कथा साहित्य में युगबोध’ विषय लेकर शोध कार्य प्रगति पर जिसमें सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक, धार्मिक एवं सांस्कृतिक विवेचना के साथ – साथ दार्शनिक, मनोवैज्ञानिक एवं शिल्पगत विशेषताओं से प्रभावित है । प्रस्तुत लेख ‘मधु कांकारिया के कथा साहित्य में पारिवारिक युगबोध’ के अंतर्गत निम्नलिखित बिंदूयों को देखा जा सकता है – संयुक्त परिवार की गृहणी जीवन, मध्यवर्गीय परिवार, आदर्श परिवार, शहरी परिवार, पति-पत्नी का सम्बन्ध, मातृत्व प्रेम या वात्सत्य तथा विधवा नारी का परिवार में युगबोध का विश्लेषण करने का प्रयत्न किया गया है । मधु कांकरिया एक समर्थ कथाकार के तौर पर पिछले चालीस वर्षों से कथा जगत में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराते रहे हैं । इनकी रचना संसार का फलक जितना व्यापक है, वैसा हिन्दी में कम ही रचनाकारों में दिखता है ।
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How to cite this article:
पंडित शिशुपाल गाँधी. मधु कांकारिया के कथा साहित्य में पारिवारिक युगबोध. International Journal of Hindi Research, Volume 7, Issue 1, 2021, Pages 38-43
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