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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
पटवारी- प्रशासन की रीढ़
Authors
मोनिश अवस्थी
Abstract

पटवारी- प्रशासन की रीढ़

मोनिश अवस्थी

पटवारी, विभाग इलेक्ट्रॉनिक एंड कम्युनिकेशन, लक्ष्मी नारायण कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलॉजी एंड साइंस महाविद्यालय, भोपाल, मध्य प्रदेश, भारत

 

सारांश

उक्त लेख शासकीय तंत्र की उस कड़ी की महत्वता को उल्लेखित करता है जो विभिन्न मोर्चों पर उपेक्षा की शिकार होती आ रही है। यह एक ऐसा संवर्ग है जो अपनी मेहनत से शासकीय जन कल्याणकारी योजनाओं को सफल बनाता आ रहा है, परंतु यह संवर्ग ना तो किसी प्रशस्ति को प्राप्त कर सका न ही शासकीय तंत्र में उन समस्त सफलताओं का ताज खुले मंच पर अपने सर पर रख सका जिसका प्रथम उत्तराधिकारी यही संवर्ग रहा। अपनी अटूट मेहनत से ही इस संवर्ग ने जमीनी स्तर पर शासन का मजबूत पक्ष प्रस्तुत किया है। उक्त संवर्ग की उपेक्षा प्रशासकीय दृष्टिकोण से भी उचित नहीं कहीं जा सकती। अपने सम्मान की लड़ाई हो या आर्थिक पहलू हो यह संवर्ग हर क्षेत्र में उपेक्षित ही रहा है। किसी भी प्रकार की आपदा हो या कोई भी जन हितेषी कार्य यह संवर्ग अपनी मेहनत का परिचय देते हुए हमेशा अडिग खड़ा हुआ दिखाई देता रहा है। आज शासन को अपनी इस कड़ी को उचित सम्मान, उचित वेतनमान देकर उसकी महत्वता को बनाए रखने की आवश्यकता है। यह संवर्ग प्रशासन की रीढ़ की तरह है, बिना इस संवर्ग के शासन के समस्त महत्वपूर्ण कार्य जमीनी स्तर तक पहुंच पाना असंभव है। अतः यह लेख इस संवर्ग की मांगों व सम्मान की लड़ाई को मजबूती प्रदान करने तथा शासन को इस संवर्ग की महत्वता प्रदर्शित करने का प्रयास करता है। जिस प्रकार बिना रीढ़ के शरीर अपाहिज हो जाता है उसी प्रकार बिना पटवारी संवर्ग की प्रशासन अपाहिज के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। अतः उक्त संवर्ग को उचित सम्मान एवं आर्थिक सुदृढ़ता प्रदान किया जाना विभिन्न पैमानों पर सटीक प्रतीत होता है।

 

मूल शब्द: पटवारी, प्रशासन, योजनाएं, जमीनी स्तर, संवर्ग, शासकीय तंत्र, मजदूर एवं किसान वर्ग।

 

प्रस्तावना

पटवारी एक ऐसा पद जो जमीनी स्तर पर शासकीय योजनाओं एवं कार्यों को अमलीजामा पहनाता है। यह एक ऐसा संवर्ग है जो निचले स्तर पर ग्रामीणों तथा कृषकों से सीधे संपर्क में होता है। ग्रामीण स्तर पर लोगों की अपेक्षा अपने पटवारी से यही होती है, कि वह शासन से प्राप्त मदद को प्रभावी रूप में उन तक पहुंचाये और इस प्रक्रिया में पटवारी द्वारा यथासंभव प्रयास किया भी जाता है। वैसे यदि हम इस संवर्ग के बारे में किसी लेख को लिखना या किसी अध्ययन को करना चाहे तो उसकी शुरुआत इतिहास के पन्नों को पलटने से ही की जा सकती है। पटवारी पद की स्थापना का श्रेय राजा टोडरमल को जाता है जो अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के दरबार में भू अभिलेख मंत्री का पद धारण किए हुए थे राजा टोडरमल का उद्देश्य शासकीय भूमि तथा निजी भूमि का उचित संधारण करना तथा उससे संबंधित कागजात को व्यवस्थित करना था जिस हेतु पटवारी पद का उत्सर्जन हुआ तथा यह संवर्ग भूमिका में आया। शेरशाह सूरी के उपरांत अकबर ने भी इस भू अभिलेख व्यवस्था को अपनाकर पटवारी को सुदृढ़ बनाया इन सब के उपरांत वर्ष 1918 तक सभी ग्रामों में ब्रिटिश शासन ने पटवारी को नियुक्त किया तथा इस संवर्ग में कुछ आवश्यक परिवर्तन भी किए यदि वर्तमान परिदृश्य में देखें तो प्रत्येक राज्य में ग्रामीण व्यवस्था में पटवारी पद मुख्य भूमिका में दिखाई देता है। पटवारी को विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे- कारनाम अधिकारी, शानबोगरु, लेखपाल आदि। आंध्रप्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, उत्तर भारत तथा पाकिस्तान में भी पटवारी शब्द प्रचलित है। गुजरात तथा महाराष्ट्र में इन्हें कुलकर्णी के नाम से जाना जाता है तो वही तमिलनाडु में पटवारी को कर्णम अधिकारी कहा जाता है पंजाब में पटवारी को पिंड दी मां अर्थात गांव की मां की संज्ञा दी गई है। राजस्थान में पटवारी को पटवार तथा हाकिम कहा जाता है। इसके अतिरिक्त उत्तराखंड में पटवारी को राजस्व पुलिस कहा जाता है तथा यहां पर 65% हिस्से में अपराध नियंत्रण, राजस्व संबंधी कार्य तथा वन संपदा की हकदारी का काम पटवारी के जिम्मे ही होता है। परंतु इन सबके बीच क्या यह संवर्ग वह हक प्राप्त कर पा रहा है जो वर्तमान में से मिलना चाहिए? यह बड़ा सवाल है! जिसका जवाब इस लेख में हम जानने का प्रयास करेंगे।

वर्तमान समय में पटवारी भारतीय उपमहाद्वीप के ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार का प्रशासनिक पद है तथा अपने क्षेत्र या हल्के के अंतर्गत आने वाले भूमि संबंधी विवाद, सीमांकन, नामांतरण, बटवारा, विरासत, जाति, आय, निवास प्रमाण पत्र आदि सभी कार्य इनके द्वारा ही संपादित हो पाते हैं। इन सभी कार्यों की अतिरिक्त समय-समय पर शासन द्वारा प्रदान किए गए अन्य कार्य भी इनके द्वारा किए जाते हैं। अतः "पटवारी- प्रशासन की रीढ़" यह कहना किसी भी प्रकार से अतिशयोक्ति नहीं होगी। यदि कोई आवेदन जिला दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत होता है तो उसकी भी जांच तथा उसमें आवश्यक कार्यवाही पटवारी के द्वारा ही की जा सकती है इसके बिना जिला दंडाधिकारी भी कोई निर्णय नहीं ले सकते। इन सब के बीच यह इस संवर्ग का दुर्भाग्य है कि पटवारी के बारे में कोई भी केंद्रीयकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है कहने को यह सरकार का प्रशासनिक पद है परंतु पद के अनुरूप सम्मान इस संवर्ग को प्राप्त नहीं है। पटवारियों ने अपने हितों की रक्षा के लिए कई जगह संघ बनाए हुए हैं तथा मध्यप्रदेश में पटवारी संघ (रजि० 3473/73) पंजीकृत संघ है।

आज का युग तकनीकी युग है तकनीक ने विभिन्न कार्यों को हर क्षेत्र में आसान बना दिया है तथा तकनीक के विस्तृत उपयोग से विभिन्न शासकीय कार्यों में बहुत अधिक परिवर्तन आ चुका है। विभिन्न शासकीय क्षेत्रों में संपादित होने वाले क्रियाकलाप पारदर्शी हो चुके हैं जिसने समाज में एक अलग छाप शासकीय कार्य के संबंध में छोड़ी है। इस तकनीकी के युग से पटवारी संवर्ग भी अछूता नहीं है, विभिन्न प्रकार के कार्य जैसे गिरदावरी, अभिलेख दुरुस्ती, सीमांकन आदि तकनीकी मदद से प्रतिपादित किए जाने लगे हैं। भारत सरकार ने वर्ष 2005 में पटवारी इनफार्मेशन सिस्टम (पीएटीआइएस) नामक सॉफ्टवेयर विकसित किया था जिससे भू अभिलेख डिजिटल माध्यम में रखा जा सके। मध्यप्रदेश में भी CLRMP Ver4B2 और भू नक्शा सॉफ्टवेयर भू अभिलेख के डिजिटलाइज्ड वर्जन को तैयार करने बनाया गया है तथा वर्तमान में वेब जीआईएस को समस्त जिलों में अनिवार्य किया गया है ताकि कार्य को तत्काल डिजिटल माध्यम से संपादित किया जा सके। इसके अतिरिक्त भी अनेक ऐप तथा सॉफ्टवेयर पटवारी द्वारा उपयोग में लाए जा रहे हैं जिससे किए गए कार्य को गुणवत्ता प्रदान की जा सके तथा त्रुटियों को कम किया जा सके। मध्य प्रदेश सरकार द्वारा हाल ही में पटवारी के लिए लैपटॉप उपलब्ध कराने की घोषणा इस संवर्ग में तकनीकी के आगमन का सूचक ही है, पूर्व में स्मार्टफोन प्रदान किए जाने की भी योजना इसी का एक उदाहरण थी, पर इन सबके बावजूद पटवारी तकनीकी पद नहीं माना जाता यह आश्चर्य की बात है। कुछ समय पूर्व ही माननीय प्रधानमंत्री जी द्वारा स्वायत्त योजना प्रारंभ की गई जिसमें पटवारी की महती भूमिका को नकारा नहीं जा सकता, चाहे प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि योजना हो या मुख्यमंत्री किसान कल्याण योजना हो इसका दारोमदार पटवारी के कंधों पर ही है। कुछ समय पूर्व सरकार द्वारा घोषणा की गई कि सीमांकन हेतु कोर्स(टॅावर) लगाए जाएंगे जिससे भूमि की पैमाइश आसानी से की जा सकेगी जिसका पायलट प्रोजेक्ट छिंदवाड़ा जिले से शुरू किया जाना था जोकि कोविड-19 के कारण प्रभावित हो सकता है। यदि इस संवर्ग को इस प्रकार तकनीकी से जोड़ना सरकार का प्रयास है और सरकार अपने हितों के लिए अपने कर्मचारियों का उपयोग करती है तो सरकार का दायित्व है कि वह भी अपने कर्मचारियों के हितों को संरक्षण प्रदान करें।

वर्तमान की परिपाटी में देखा जाए तो अनेकों योजनाएं पटवारी संवर्ग से जुड़ी होती हैं तथा वर्तमान समय में पटवारी अपने मुख्य कार्य के अतिरिक्त भी अनेक कार्य बड़ी मेहनत से संपादित कर रहे हैं, परंतु इस संवर्ग की भी कुछ अपेक्षाएं हैं जो सीधे तौर पर शासकीय तंत्र से जुड़ी हुई हैं जिस पर ध्यान देना उच्च शासकीय तंत्र आवश्यक नहीं समझता है, परंतु ऐसा करके वह खुद विफलता की ओर बढ़ रहा है। सरकार अपने प्रत्येक कर्मचारी की संरक्षक होती है परंतु सरकार की अनदेखी से इस संवर्ग में रोष व्याप्त हो गया है। चाहे वेतन विसंगतियां हो, पदोन्नति हो, क्रमोन्नति हो इस संवर्ग की अनदेखी सरकार द्वारा होती रही है जिससे यह संवर्ग आज अपने सम्मान की लड़ाई लड़ने पर मजबूर है यदि विभिन्न राज्यों की ओर दृष्टि डालें तो मुख्य रूप से कुछ राज्यों में वेतनमान जैसे पंजाब में 3200/-, हिमाचल प्रदेश में 3200/-, मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में 2100/-, समान संवर्ग में वेतनमान विसंगतियों का एक स्पष्ट उदाहरण पेश करता है जो कि सर्वथा अनुचित है। यदि मध्य प्रदेश के परिक्षेप्य में दृष्टि डालें तो पटवारी को वेतन एवं भत्ता आज भी वर्षों पुराने पैमानों के अनुसार मिल रहा है जो कि उक्त संवर्ग के लिए सही नहीं कहा जा सकता है। रेलवे का चतुर्थ श्रेणी का कर्मचारी भी पटवारी जो की तृतीय श्रेणी के अंतर्गत आता है से भी अधिक वेतन प्राप्त कर रहा है। विभिन्न स्तरों पर आज पटवारी से जिस प्रकार कार्य लिया जा रहा है उसके अनुसार इस संवर्ग को सुविधाएं मुहैया नहीं कराई जा रही हैं पर क्या यह परिणाम इस संवर्ग के द्वारा किए गए पूर्व के क्रियाकलापों का है? इस सवाल का जवाब इस संवर्ग को खुद से लेना होगा क्योंकि इसका बेहतर जवाब इस संवर्ग के अतिरिक्त किसी से प्राप्त किया जाना संभव नहीं होगा। आज यह संवर्ग अपने सम्मान की लड़ाई लड़ने पर विवश हो चुका है और यह वक्त परिवर्तन का है पटवारी संवर्ग में आज भी कई वर्ष पुरानी प्रणाली का उपयोग हो रहा है जिससे इस संवर्ग को खुद ही बाहर आने के रास्ते तलाशने होंगे। स्वामी विवेकानंद जी ने कहा है -"उठो जागो और तब तक ना रुको जब तक लक्ष्य प्राप्त ना कर लो", आज इस कहावत को पटवारी संवर्ग को चरितार्थ करके दिखाना होगा। गुलामी के प्रशासन से निकलकर खुद की हितों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध होना होगा तभी खुद को शोषण रूपी दानव के चंगुल से निकाल सकते हैं। इन परिस्थितियों में आवश्यक यह होगा कि संपूर्ण प्रदेश एवं देश के प्रत्येक पटवारी को निडर होकर आगे आना होगा अपने सम्मान की रक्षा करनी होगी अपनी जायज मांगों को प्राप्त करने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा क्योंकि प्रत्येक पटवारी को मिलाकर यह संवर्ग बनता है और एक संघ या संगठन का निर्माण होता है इसलिए कहा जाता है संगठन में ही शक्ति है। वक्त आ चुका है शक्ति प्रदर्शन का संघे शक्ति कलियुगे को प्रदर्शित करने का। वर्तमान में संतोष मल्होत्रा जी के द्वारा लिखी गई एक किताब 'Reviving Jobs: An Agenda for Growth' में देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने में शासकीय कर्मचारियों को मिलने वाले वेतन एवं भक्तों के महत्व को स्पष्ट बताया गया है इसमें कहा गया है कि शासकीय कर्मचारियों को सम्मानजनक वेतन देना देश की अर्थव्यवस्था में सुधार का भी माध्यम है क्योंकि यदि कर्मचारियों के पास वेतन ज्यादा होगा तो खर्च करने की क्षमता अधिक होगी जिससे मांग अधिक होगी तथा निर्माण क्षेत्रों में मांग बढ़ेगी। इस किताब में पेंशन की महत्व को भी समझाया गया है तथा अर्थशास्त्रियों ने पुरानी पेंशन व्यवस्था को ही सटीक मत दिया है नवीन पेंशन व्यवस्था किसी भी प्रकार से कर्मचारी एवं देश की अर्थव्यवस्था की हितेषी नहीं कही जा सकती है तथा शासकीय नौकरियों में उच्च वेतनमान किसी भी प्रकार से देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान नहीं पहुंचाता है एवं वेतन विसंगतियों को दूर करके कर्मचारियों के हाथों में पैसा पहुंचाने से देश की अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव ही दिखाई देगा।

आज विभिन्न शासकीय क्षेत्रों में भ्रष्टाचार की दीमक लगी हुई है जो शासकीय तंत्र में इस कदर घर कर चुकी है कि शासकीय तंत्र खोखला हो चुका है और इस तंत्र को दुरुस्त करने के लिए व्यापक बदलाव की आवश्यकता है कई वर्ष पूर्व कैलिफोर्निया ने भ्रष्टाचार को कम करने के लिए तकनीकी का इस प्रकार से प्रयोग किया कि विभिन्न कार्यालयों में होने वाले भ्रष्टाचार को लगभग 60% तक कम कर दिया गया एवं बाबू प्रथा पर भी लगाम लगाने का उचित बंदोबस्त किया गया। आज ऐसा ही व्यापक बदलाव भारत में भी होना आवश्यक है। यदि पटवारी संवर्ग की ओर देखा जाए तो अनेक मामलों में भ्रष्टाचार के आरोपों में पटवारी दोषी बनता है पर यदि कुछ मामले सही हैं तो इसके पीछे कुछ शासकीय तंत्र की विफलता के परिणाम भी हैं। पटवारी किसी कार्य को जब वरिष्ठ के समक्ष रखता है तब विभिन्न स्तरों पर की जाने वाली अनुचित मांगों का दबाव भी पटवारी ही सहन करता है और मांगों को पूरा करने की गलफत में खुद ही दोषी साबित हो जाता है पर उसके पीछे की वजह कोई नहीं देखता। खैर विडंबना है घोर विडंबना। पटवारी जब ग्रामों में गरीब किसानों मजदूरों की मदद करता है तब पटवारी का दिल पसीज भी जाता है और गरीब किसान मजदूरों की मदद के लिए तत्पर हो जाता है शासकीय तंत्र में जो वरिष्ठ अपनी मांगों की भीख मांगने बैठे होते हैं उनको गरीबों की गरीबी किसान मजदूरों की मजबूरी दिखाई नहीं देती और कार्य टलते चले जाते हैं बार बार कार्यालय के चक्कर लगवाए जाते हैं। इन सबके बीच पटवारी अपने बूंद भर वेतन में अपने परिवार की जरूरत को पूरा करें या अपनी आत्मीयता की रक्षा के लिए गरीब किसानों मजदूरों की मदद हेतु वरिष्ठों की मांगों की पूर्ति करें। इन सब परिस्थितियों में कहीं ना कहीं दोषी पटवारी को बनाया जाता है जब वह मजबूरी में भ्रष्टाचार का दामन थामने विवश हो जाता है। किसी ने सच कहा है वह कौन सी आत्मा होगी जो महीने का लगभग 40,000/- कमाने के बाद भी 200/- दिन की मजदूरी कर परिवार का पेट पालने वाले से भी कुछ पाने की इच्छा रखती होगी। परंतु अंत में इन शब्दों का सार यही है कि इन सब परिस्थितियों में अब खुद के सम्मान की रक्षा के लिए पटवारी संवर्ग को आगे आना होगा लड़ाई चाहे वेतनमान की हो या सुविधाओं की यह संवर्ग का हक है उसके लिए लड़कर भी लेना पड़े तो लेना होगा। आपसी मतभेद को दूर कर एकजुट होना होगा क्योंकि यह संगठन एक परिवार है और परिवार में मतभेद हो सकते हैं परंतु मन भेद नहीं होना चाहिए और यदि इस इस संवर्ग की कुछ मांग है तो उसे मांगना भी जरूरी है।

संदर्भ

  1. www.wikipedia.com
  2. विभिन्न राज्यों के राजस्व मंडल की जानकारी स्रोत शासकीय वेबसाइट।
  3. मध्य प्रदेश पटवारी संघ के द्वारा जारी विभिन्न पत्र एवं प्रकाशन।
  4. मध्य प्रदेश भू राजस्व संहिता।
  5. मध्य प्रदेश भू अभिलेख नियमावली।
  6. Reviving Jobs: An Agenda for Growth by Santosh Malhotra.

Chapter VII of Punjab land Administration manual.

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Pages:12-15
How to cite this article:
मोनिश अवस्थी "पटवारी- प्रशासन की रीढ़ ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 12-15
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