ARCHIVES
VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लोक साहित्य की प्रासंगिकता
Authors
डाॅ शारदा प्रसाद
Abstract
लोक साहित्य सामान्य जन के हृदय से निकली हुई सहज अनुभूतियों की वह पवित्र मंदाकिनी है, जिसमें कलुपता लेशमात्र को भी नहीं। यह जन-जन के कंठ में व्याप्त मधुर अनुभूतियां हैं। जिसमें सामन्य जन के हर्ष-विषाद्, रूदन-हृास, उल्लास-परिहास, रीति-परंपरा, तीज-त्यौहार व्रत इत्यादि सहज ही कथा, कहानी और गीत-संगीत के माध्यम से अनायास ही प्रस्फुटित हो जाते हैं। इसीलिए लोक साहित्य को सतत् प्रवाहमान नदी की धारा और शिष्ट साहित्य को बंधा हुआ जलाशय भी कहते हैं। आज हम ग्लोबलाइजेशन के जिस संकटमय दौर से गुजर रहे हैं इसमें लोक साहित्य की महŸाा और भी बढ़ जाती है। हम भले ही देश-विदेश में घूम आएं परन्तु सुकूून तो अपने घर में ही मिलता है। लोक साहित्य में ही हमारी संस्कृति निहित है। भारतीय संस्कृति लोक की संस्कृति है, जिसमें किसी प्रकार का बनावटीपन नहीं है। यह सामूहिकता की संस्कृति है जहां व्यक्तिवादिता के लिए कोई स्थान नहीं है। लोक संस्कृति ही भारतीय जीवन का आधार है। लोक-लय में ही जीवन स्पंदित है। लोक जीवन के माध्यम से ही आम जन या ’लोक’ अपने सुख-दुःख की अभिव्यक्ति करता है। व्रत-त्यौहार जीवन की एकरसता में सावन के मधुर झोकों के समान रस-वृष्टि करता है जिससे थके-हारे, व्यथित, श्रमित मन को जीवन की नवीन ऊर्जा प्राप्त होती है। जन-जन की चेतना की ललित अभिव्यक्ति ही लोक साहित्य में रूपाकार ग्रहण करती है। लोक साहित्य का क्षेत्र अत्यन्त व्यापक है। किसी भी राष्ट्र की धार्मिक, भौगोलिक, सामाजिक, आर्थिक, ऐतिहासिक, नैतिक और साहित्यिक महत्व की बातें लोक साहित्य मंे अनायस ही मिल जाती हैं। यही कारण है कि जब कभी इतिहास भी प्रमाण देने में मौन हो जाता है, तब लोक संस्कृति या लोक साहित्य हमें यह उपलब्ध करा देते हैं। अतएव आज लोक साहित्य और लोक संस्कृति को बचाने की आवश्यकता है।
Download
Pages:05-06
How to cite this article:
डाॅ शारदा प्रसाद "वर्तमान परिप्रेक्ष्य में लोक साहित्य की प्रासंगिकता". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 05-06
Pdf, Certificate, Cover Page, Index Page, Editorial Page, Accept Letter
Please enter the email address corresponding to this article submission.

