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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
लोकगीतों का स्वरूप
Authors
डॉ. विश्वनाथ महादू देशमुख
Abstract
भारत देश सांस्कृतिक विविधता का वहन करनेवाला देश है। अनेकता में एकता इसकी ताकत है। साहित्य नागरी संस्कृति का परिणाम है, तो लोकसाहित्य ग्राम, देहात का। लोकसाहित्य के विविध रूपों के दर्शन होते हैं। लोककथा, लोकगीत, लोककला, लोकनाट्य, कहाँवते, लोकप्रचार आदि कई रूपों के दर्शन होते हैं। लोकगीत लोकसाहित्य का आत्मा है। जनमानस के सांस्कृतिक, पारंपारिक मूल्यों का दर्शन लोकगीतों के माध्यम से प्रकट होता है। गीतों के माध्यम से परंपरा का निर्वाह, जनजीवन की अभिव्यक्ति प्रस्तुत होती है। लोकगीत लोकसाहित्य का प्रमुख अंग है। भारत के प्रत्येक प्रांत में लोकगीतों का मधुर संगीत का स्वर गूंजता हुआ प्रतित होता है। लोकसाहित्य के अंतर्गत लोकगीत अंतर्भूत होते हैं। लोकगीतों को लोकसाहित्य का आत्मा कहा जाता है। लोकसाहित्य के प्रत्येक अंगों में लोकगीतों की धून बजती रहती है। इन गीतों का प्रवाह प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक बहते हुए जनमानस के हृद्य के गान को प्रस्तुत कर रहा है। प्राचीन काल से पीढ़ी-दर-पीढ़ी संक्रमित होते-होते लोकगीतों की परंपरा का प्रवाह अविच्छिन्न रूप से प्रवाहित हो रहा है। लोकगीतों का निर्माता अनभिज्ञ होता है। गांव-देहातों में जनसामान्य मौखिक रूप को अपनाते हुए अपने सुख-दु:ख के क्षणों को इन लोकगीतों के सहारे व्यक्त करते हैं। लोकगीतों के माध्यम से लोकजीवन का दर्शन सहज होता है।
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Pages:36-39
How to cite this article:
डॉ. विश्वनाथ महादू देशमुख "लोकगीतों का स्वरूप ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 36-39
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