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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
पटरंगपुर पुराण में आंचलिकता के विविध आयाम
Authors
डॉ. शिप्रा श्रीवास्तव सागर
Abstract
आंचलिकता की परिपक्वता जीवन की समग्रता में है। शाब्दिक अर्थ के अंतर्गत आंचलिकता- संज्ञा स्त्रीलिंग {संस्कृत आंचलिक़ ता (प्रत्यय)}, क्षेत्र विशेष संबंध रखने वाली स्थिति। प्रत्येक उपन्यास में स्थानीयता का रंग तो रहता ही है परंतु आंचलिक उपन्यास में उस अंचल की संस्कृति- वेशभूषा इत्यादि की एक गहरी छाप होती है तथा भाषा का महत्वपूर्ण प्रभाव भी दिखाई देता है। आधुनिक युग में नव्यतर विधाओं के संदर्भ में आंचलिकता एक दिशा की उपलब्धि हैं। व्यष्टि सत्य और समष्टि सत्य का उपन्यासों के धरातल पर दो रूपों में विकास हुआ है। व्यष्टि सत्य को विद्वानों ने माक्र्स, फ्रायड, एडलर, युंग, सार्त्र आदि की वैचारिक भूमिका पर ग्रहण किया तो समष्टि सत्य की चुनौतियों को ‘आंचलिकता’ ने स्वीकार किया है। आंचलिकता के स्वरूप निर्धारण, उद्घाटन, प्रस्तुतीकरण आदि में अनेक तत्वों का सामूहिक योगदान होता है। ‘पटरंगपुर पुराण’ में भी आंचलिकता के अनेक तत्वों का समावेश है। स्वभाविकता तथा वातावरण की सजीवता पटरंगपुर पुराण की एक प्रमुख विशेषता है जो इसे आंचलिकता के और भी करीब ले आता है।
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Pages:65-68
How to cite this article:
डॉ. शिप्रा श्रीवास्तव सागर "पटरंगपुर पुराण में आंचलिकता के विविध आयाम ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 65-68
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