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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 2 (2021)
‘गोदान’ में सामन्ती – महाजनी शोषण के विरुद्ध दलितों के मौन – मुखर विद्रोह का ऐलान
Authors
डॉ. मिनी जोर्ज
Abstract
प्रेमचन्द दलित व शोषित जीवन को हिन्दी साहित्य के केन्द्र में लानेवाले प्रथम लेखक हैं। उन्होंने औपनिवेशिक शासन और सामन्ती, महाजनी व्यवस्था के क्रूर शोषण, दमन और उत्पीडन के साये में साँस ले रहे शोषित जन की मूक – व्यथा को अभिव्यक्ति देने के साथ-साथ शोषण के विरुद्ध उनके मौन – मुखर विद्रोह का ऐलान कर उन्हें अपने अधिकार के प्रति सचेत भी किया। गोदान प्रेमचन्द की औपन्यासिक कला का चरमोत्कर्ष है। यह किसानों के शोषण की महागाथा है। अपने काल और देश के फलक पर चित्रित भारतीय किसान गोदान में अपनी समूची समस्याओं, राग – विराग, शक्ति – सीमा तथा संक्रान्तियों के साथ उभरा है। गोदान में जगह – जगह दलितों के क्रान्तिकारी कदमों की आहट सुनाई पडती है। गोदान में व्यवस्था की विद्रूपता के प्रति नारी संघर्ष मुखरित है। प्रेमचन्द ने जहाँ दलित वर्ग के सामाजिक, धार्मिक आर्थिक, दैहिक और भावनात्मक शोषण की दोहरी नैतिकता को अभिव्यक्ति दी वहाँ उस शोषण के विरुद्ध दलितों के मौन – मुखर विद्रोह को भी सशक्त वाणी दी।
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Pages:84-89
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डॉ. मिनी जोर्ज "‘गोदान’ में सामन्ती – महाजनी शोषण के विरुद्ध दलितों के मौन – मुखर विद्रोह का ऐलान ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 2, 2021, Pages 84-89
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