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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
तुलसी के आदर्श आज के परिपेक्ष्य में
Authors
सविता सोनी
Abstract
भारतीय इतिहास के मध्यकाल के ठीक “स्वर्णयुग“ के बीच तुलसी उसे कलयुग के रूप में उदघोषित करते और अपने काव्य की समस्त चेतना तथा शक्ति से उसको चुनौती देते हैं । तुलसी का रामचरित मानस हिन्दी साहित्य का दर्पण है, तत्कालीन समाज का दपर्ण है, संस्कृतिक दस्तावेज है । भारत के परम्परागत विश्वासों तथा पौराणिक कथाओं का भन्डार हैं। वह हिन्दी साहित्य की सर्वोत्कृष्ट रचना है । जिसमे काव्य शास्त्र के सभी विषयों के उदाहरण मिलते हैं इसलिये रामचिरत मानस का ऐतहासिक महत्व है और सदा रहेगा । रामचन्द्र शुक्ल जी का मानना है कि गोस्वामी जी की भक्ति पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता है - सर्वांग पूर्णता । जो जीवन के किसी भी पक्ष को छोड़कर नही चलते सभी पक्षों के साथ उसका सामंजस्य है न कर्म से या धर्म से विरोध न ज्ञान से । धर्म तो नित्य लक्षण है । तुलसी की भक्ति, धर्म, और ज्ञान दोनों की रसानुभूति कह सकते हैं । इसमे योग का भी उतना ही समन्वय है । तुलसी का साहित्य पूरणमासी के चांद की तरह चमकने के कारण ही साहित्य जगत में “सूर -सूर तुलसी ससि“ की उक्ति प्रचलित है और सत्य भी है क्योंकि तुलसी के साहित्य में जहां भक्ति के विभिन्न स्वरूप हैं वहीं अर्थ की गंभीरता, सरसता, प्रभावशीलता, अभिव्यंजना कौशल भी है । ऐसा साहित्य में कोई और तुसली का साहित्य, शास्त्र ग्रन्थों का निचोड़ नही है । साहित्य में लोक मंगल की भावना तथा धर्म व मर्यादा के प्रति चैतन्य भी है। साहित्य में धर्म, संस्कृति तथा संस्कारों की त्रिवेणी बहती है और यही साहित्य का लोकरंजक रूप जन जन तक पहुँचाया रामचरित मानस से । अपने आराध्य राम को अवतारी मानव के रूप में कई आदर्श स्थापित करे हैं तो कहीं दुष्टहन्ता, गरीबनिवाज, धर्मसंरक्षक तो कहीं शरणागत भक्त वत्सल के रूप मेें वर्णन किया है । इसमे शक्ति- शील और र्सौन्दर्य का अदभुत समन्वय है यही कारण है की रामचरित मानस विश्व प्रसिद्ध ग्रन्थ है । रामचरित मानस आज के संदर्भ में देखें कि कैसा परिवार, कैसी राजनीतिक व्यवस्था तथा समाज में कैसे नैतिक गुणों का तथा विभिन्न मनोंभावोें का प्रसार हो।यही कारण है कि मानस का उद्देश्य आज के परिपेक्ष्य में अपनी प्रसांगिकता बनाये हुये है ।
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Pages:18-22
How to cite this article:
सविता सोनी "तुलसी के आदर्श आज के परिपेक्ष्य में ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 18-22
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