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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
समकालीन कविता में लोक की अभिव्यक्ति
Authors
अरविंद कुमार यादव
Abstract
लोक का अपना साहित्य होता है जिसमें उनका उत्सव, लोक-रंग, रागतत्व आदि की अभिव्यक्ति होती है । लोक का साहित्य किसी एक व्यक्ति द्वारा रचित नहीं होता है । यह लोक द्वारा रचित और संरक्षित होकर लोक की संपत्ति हो जाती है । प्रत्येक लोक साहित्य की अपनी भाषा होती है जिसके माध्यम से वह स्वयं प्रकट करती है । समय परिवर्तन के साथ-साथ लोक साहित्य में भी परिवर्तन होता रहता है । यह परिवर्तन संबंधित लोक द्वारा ही होता है। इस प्रक्रिया में लोक साहित्य की रचना, उसमें परिवर्तन और उसका संरक्षण लोक द्वारा होता रहता है । यह तो उनका अपना साहित्य हुआ जो उनकी लोक भाषा में अभिव्यक्त होता है । लोक से इतर जो शिष्ट लोगों की भाषा होती है उसमें भी लोक के तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं । हिंदी की समकालीन कविता इस मायने में धनी है कि इसमें लोक का रंग ज्यादा चटख है । अस्सी का दशक बीतते-बीतते हिंदी की कविता में लोक का रंग चोखा होता गया । इसके पीछे बाजार की एक बड़ी भूमिका थी । इस बाजारवादी युग से पूर्व भी हिंदी कविता लोक के रंग से रंगी रही है । केदारनाथ सिंह, नागार्जुन सरीखे समकालीन कविता के वरिष्ठ कवि अपनी कविताओं में अपना लोक भी लेकर आते हैं ।
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Pages:33-36
How to cite this article:
अरविंद कुमार यादव "समकालीन कविता में लोक की अभिव्यक्ति ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 33-36
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