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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
आदिवासी उपन्यास तथा पारिस्थितिकी-तंत्र का विश्लेषण
Authors
डॉ. राठोड पुंडलिक
Abstract
पारिस्थितिकी तंत्र एक सुसंगठित एवं प्राकृतिक संसाधन क्षेत्र होता है। इस तंत्र की उत्पादकता इसमें ऊर्जा की सुलभता एवं ऊर्जा की संतुलित गति पर निर्भर करती है। यह एक खुला तंत्र होताहै जिसमें पदार्थो तथा ऊर्जा का सतत निवेश (Input) तथा बहिर्गमन (Output) होता है। यह निवेश और बहिर्गमन प्रक्रिया कई प्रकार के पोषण स्तरों से युक्त खाद्य सृखलाओं एवं खाद्य जालों के माध्यम से संपन्न होती है। पारिस्थितिकी तंत्र में जैविक और अजैविक घटक होते हैं। इन सारे घटकों के बीच अंतर्संबंध होता है जो अघोषित प्राकृतिक नियमों के अनुसार चलता है। जैविक और अजैविक घटकों की कुछ सीमाएँ तथा कुछ विशेषताएँ होती हैं। फलत: परितंत्र में अघोषित प्राकृतिक नियमों का पालन अनायास होता रहता है। आज के वैश्वीकरण और बाजारवाद के समय में परितंत्र में प्राकृतिक नियमों का उल्लंघन हो रहा है| परिणामस्वरूप परितंत्र सिमटते जा रहे हैं और पर्यावरणीय समस्याएँ उत्पन्न हो रही हैं। आदिवासी समाज परितंत्र में प्राचीन काल से जीवनयापन करता आया है। उसकी जीवन शैली परितंत्र के अघोषित नियमों के अनुरूप होती है। आदिवासी उन नियमों का पालन करते हुए वन्य-जीवों के प्राकृतिक अधिकारों को मान्यता देते हैं तथा प्रकृति, परितंत्र, वन्य-प्राणियों के साथ सहजीवी जीवन व्यतीत करते हैं। आज आदिवासियों के प्रकृति प्रेमयुक्त जीवन को सभ्य समाज द्वारा स्वीकार करने की आवस्यकता है।
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Pages:48-55
How to cite this article:
डॉ. राठोड पुंडलिक "आदिवासी उपन्यास तथा पारिस्थितिकी-तंत्र का विश्लेषण ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 48-55
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