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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
हिंदी दलित आत्मकथाओं की भाषा
Authors
वंदना एस
Abstract
साहित्य-सृजन का लक्ष्य मात्र किसी विषय के वर्णन तक सीमित नहीं है, अपितु उस विषय की पृष्ठभूमि में कार्यरत समाज-विशेष की पहचान से भी उसका संबंध है। हिंदी साहित्य की दुनिया में दलित साहित्य की चर्चा हमेशा होती रहती है। आत्मानुभूति की अभिव्यक्ति होने के कारण इस साहित्य ने मानव-जीवन के निकटतम स्थान पाया है। इसमें भी दलित आत्मकथा ने अपनी अलग ही पहचान बनाई है। क्योंकि उन्होंने जो जीवन जिया है वह निस्संदेह भयावह है। उसमें चित्रित दरिद्रता, अपमान, शोषण – सब सच हैं। ‘यह मेरी जिंदगी नहीं है, यह मुझ पर थोपी गई है’ – का स्वर इन आत्मकथाओं में मुखरित होता है। इसके अलावा एक ओर ये बीते हुए भयावह कल को रखांकित करती हैं तो दूसरी ओर उनका शोषण करने वाली व्यवस्था पर सवाल उठाती हैं। इन प्रश्नों को भूलकर अगर हम इन आत्मकथाओं की साहित्यिकता, कलात्मकता, भाषा, रूप और शैली पर ही चर्चा करेंगे तो निस्संदेह यह कहा जा सकता है कि इन आत्मकथाओं का उद्देश्य आपके लिए अनजान है। दलित आत्मकथाओं पर हमेशा आरोपों से वार किया गया। कभी अश्लीलता का तो कभी इनके अनुभवों पर झूठ का आरोप लगाया गया। दलित लेखकों से अक्सर यह सवाल पूछा गया कि युवावस्था में कोई कैसे आत्मकथा लिख सकता है? क्योंकि अनुभवी होने के लिए आदमी को कम से कम ५०-५५ साल पार करने पड़ते हैं। यहाँ लोग एक तथ्य भूल जाते हैं कि एक मध्यवर्गी और दलित के जीवन में ज़मीन-आसमान का अंतर होता है, अपनी छोटी उम्र में वह एक पूरी जिंदगी जी चुका होता है। जन्म लेते ही हज़ारों वर्षों का दुःख और दरिद्रता उसे प्राप्त होता है और उन अनुभवों को लिपिबद्ध करने हेतु पचासों - साठों साल रुकने की आवश्यकता नहीं होती है। जब वह लिखने बैठता है तो उन्ही तिक्त अनुभवों से फिर से उसे गुज़रना पड़ता है, बाद में उन अनुभवों को क्रमबद्ध करके अपना इतिहास वह प्रस्तुत करता है। आत्मकथाओं में असत्य घटनाओं के लिए कोई स्थान नहीं होता। इन अनुभवों को लेखक शरण कुमार लिम्बाले ‘रॉ मटेरियल’ मानते हैं। इनके द्वारा ही आत्मकथा की सफलता का निर्धारण होता है। उसमे आए सभी अनुभव लेखक के विशेष अनुभव होते हैं क्योंकि सामान्य अनुभव तो हर कोई भूल जाता है, मगर जो विशेष होते हैं वे स्मृति पटल पर हमेशा छाए रहते हैं। दलित आत्मकथाएं बहु चर्चित होने का कारण भी यही है।
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Pages:37-40
How to cite this article:
वंदना एस "हिंदी दलित आत्मकथाओं की भाषा ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 37-40
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