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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
हिन्दी काव्यशास्त्र का उद्भव एवं विकासः एक अध्ययन
Authors
डाॅ. हेमन्त सिंह कंवर
Abstract
भारतीय काव्यशास्त्रीय विद्वान आचार्य भरत को काव्यशास्त्र का आद्य आचार्य और उनके ग्रंथ ‘नाट्यशास्त्र’ को प्रथम काव्यशास्त्रीय ग्रंथ मानते हैं। शिव सिहं सरोज के अनुसार हिन्दी से प्रथम आचार्य ‘पुष्य’ थे, जिन्होंने अपभं्रश भाषा में अलंकार ग्रंथ का प्रणयन किया था। किन्तु पुष्य के द्वारा सृजित काव्यशास्त्रीय ग्रंथ अनुपलब्ध हैं। हिन्दी साहित्य में काव्य का महत्त्वपूर्ण स्थान है। काव्य की एक विधा ‘छन्दों’ से जहाँ काव्य में लय, गति एवं संगीतात्मकता आती है, वहीं, ‘रस’ मनुष्य को सुखद-दुःखद अनुभूतियों के हिडोलों में झुलाते रहते हैं। काव्य में अलंकारों का भी अपना विशेष महत्त्व है। भारतीय काव्यशास्त्रा में अलंकार के लिए तीन शब्द प्रयुक्त हुए हैं- अलंकार, लक्षण और चित्रा। इनमें सर्वमान्य और सर्व प्रचलित शब्द है अलंकार। आचार्य शुक्ल कृपाराम कृत ‘हित तरंगिणि’, संवत् 1588 को प्रथम काव्यशास्त्रीय ग्रंथ स्वीकार करते हैं।
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Pages:69-72
How to cite this article:
डाॅ. हेमन्त सिंह कंवर "हिन्दी काव्यशास्त्र का उद्भव एवं विकासः एक अध्ययन ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 69-72
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