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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
डाॅ0 श्यामसुन्दर दुबे के नवगीतों में ग्राम्य-बोध
Authors
डाॅ0 अम्बिका प्रसाद
Abstract
नवगीत विचार, नवगीत परम्परा, कथ्य लोक जीवन के विद्रूपडॉ0 श्यामसुंदर दुबे के नवगीत विचारों और भावों के सन्धि पत्र हैं। गीतकार अपने परिवेश और समय से जूझता है, उसकी तड़प और बेचैनी बेहद मुखर हो उठती है, लेकिन अपनी इस बेचैनी को वह बेहद शांत ढंग से लगभग निरूद्वेग होकर व्यक्त करता है। नवगीत में लोक जीवन को व्यक्त करना अपेक्षाकृत कठिन है। रचनाकार डॉ0 दुबे अपने पाठकों में एक टीस पैदा करता है यह टीस चीजों के छूटने का छूटते जाने के दर्द और संत्रास से भरी हैं।यह छूटती और टूटती चीजें जंगल, नदी, नाले, पहाड़, गांव और संयुक्त परिवार हैं और मानव मूल्य भी। डाॅ0 दुबे का कथ्य लोक जीवन के विद्रूप होते अंतर्वाह्र पर्यावरण के जीवंत साक्ष्य नहीं बल्कि भोगे हुए अहसास हैं, जो पाठकों को अपनी पीड़ा और उल्लास का भागीदार बना लेते हैं। गीतकार डॉ0 दुबे आधुनिकता के बीच अपनी खोती लय को पकड़ने का प्रयास करता है, जिसके बदल जाने या छूट जाने से गीतकार आहत हुआ है, जो उनके नवगीतों में स्पष्ट है। यह नवगीत अपनी कहन और बनक दोनों में नवगीत परम्परा की दिशा तय करते हैं।
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Pages:79-80
How to cite this article:
डाॅ0 अम्बिका प्रसाद "डाॅ0 श्यामसुन्दर दुबे के नवगीतों में ग्राम्य-बोध ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 79-80
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