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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
मन्नू भण्डारी की कहानियों में नारी-विमर्श
Authors
धर्मेन्द्र कुमार पासी
Abstract
भारतीय समाज में नारियों की दशा प्राचीन काल से ही दयनीय रही है। परंपरा और संस्कारों के नाम पर जबरन उन्हें घर की चारदीवारी में कैद रखा गया। पितृसत्तात्मक व्यवस्था के सिद्धांतों का हवाला देकर उनका भरपूर मानसिक और शारीरिक शोषण किया गया। उन्हें उनके मूल अधिकारों से भी वंचित रखने की कोशिश की गई जबकि धरातल में नारियों और पुरुषों का समान अधिकार है। लेकिन वर्तमान परिस्थितियां बदल चुकी हैं। नारियां चेतना संपन्न होकर अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए विद्रोह और संघर्ष का रास्ता चुन चुकी हैं, अब नारियां घर की चारदीवारी में सिमटकर नहीं बल्कि मुक्त होकर जीना चाहती हैं। नारी जीवन से जुड़ी इन्हीं परिस्थितियों को विमर्श के माध्यम से दिखाने की कोशिश की गई है। नारी की पीड़ा, वेदना, सुख-दुख, राग- विराग, अस्मिता, आत्मनिर्भरता और स्वतंत्रता को विभिन्न परिप्रेक्क्षों में दिखाया गया है। मन्नू भंडारी की कहानियों में ये सभी तत्व व पहलु प्रत्यक्ष रूप से उभरकर हमारे सामने आते हैं] जिसका चित्रण आलेख में किया गया है।
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Pages:89-92
How to cite this article:
धर्मेन्द्र कुमार पासी "मन्नू भण्डारी की कहानियों में नारी-विमर्श ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 89-92
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