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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
समसामयिक सिक्किमेली संस्कृत कथा के संदर्भ में “कथा-कलिका”
Authors
Hemanth Kumar Nepal
Abstract
समग्र रूप में देखा जाए तो जो कथनात्मक है उसे कथा कहा जाता हें, जो कथ्य परक हैं उसे कथा कहा जाता हैं एवं जिसको कहा जाता है वो भि कथा हैं। कथा भि दो प्रकार के होते हैं लोक कथा एवं सृजनात्मक कथा। मौखिक, अलिखित श्रुति परम्परा से लोक जिवन में प्रचलित कथा को लोक कथा एवं कथाकार की कल्पनिक अनुभूति से सिर्जित कथा को सृजनात्मक कथा कहा जाता हैं। साहित्यिक गद्य विधा के उपविधा के रूप में कथा का महत्वपूर्ण स्थान हैं। कथा विकास क्रमकी सुरुवात मनव सभ्यता के विकास क्रम से ही हुआ हैं। सिक्किमेली संस्कृत काथा के संदर्भ मे कथा-कलिका प्रथम कथा संग्रह हैं। इसका प्रकाशन सन् २०१८ में हुआ हैं। कथाकार शिवप्रसाद पोख्रेल ने अपने प्रथम कथा संग्रह होने से इसका नाम कथा-कलिका रखा हैं। ये कूल बाध्यता, निश्चला, परिभ्रमणम्, मदीया स्वर्णमुद्रिका कथा, मोहनस्य भाटकगृहान्वेषणम्, अपूर्णः स्वप्नः, वराकिणी कृष्ण, सन्तवीरस्य शिरस्त्रम्, सुष्मिता एवं परिवर्तते दश कथा का संग्रह हैं। समसामयिक कथा लेखन की दृष्टि में कथाकार ने हिमलयीय राज्य सिक्किम को सुख एवं शान्ति प्रदान करने वाली प्रकृति की अनेक रूप की वर्णन के साथ ही स्थानीय सामाजिक व्यवस्था, अवस्था, समस्या आदिका कथा की व्याज से प्रत्यक्ष प्रस्तुत किया हैं। संस्कृत भाषा में स्थानीय विषय ग्रहण के माध्यम से विरचिय इस संग्रह के कथा पाठकौं को ज्ञानवर्धन एवं रसास्वादन कराने में सफल हैं। स्वकीयानुभव कथाकार के कथाकारीता की प्रमुख विशेषता हैं। कथा की भाषा-शैली स्वभाविक, सरल, सुमधुर, सुबोध्य एवं प्रभावमय हैं। संस्कृत विभाग, मैत्रेयी महाविद्यालय (दिल्ली विश्वविद्यालय), नई दिल्ली एवं संस्कृत विभाग, रामबचन सिंह राजकीय महिला महाविद्यालय, मऊ, उ.प्र के संयुक्त्त तत्वावधान मे आयोजित अन्तर्राष्ट्रीय ई-शोध संगोष्ठी में शिवप्रसाद पोख्रेल द्वारा विरचित कथा-कलिका कथा संग्रह के प्रमुख कथाऔं का कथाकारिता, प्राकृतिक एवं समसामयिक स्थानीय अवस्था, व्यवस्था और समस्या का अध्ययन किया जाएगा।
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Pages:98-100
How to cite this article:
Hemanth Kumar Nepal "समसामयिक सिक्किमेली संस्कृत कथा के संदर्भ में “कथा-कलिका” ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 98-100
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