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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 3 (2021)
योग दर्शन में ईश्वर का स्थानः एक साधन या साध्य
Authors
सचिन भारद्वाज, गणेश शंकर गिरी
Abstract
संसार में मानव जीवन के सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति हेतू हमें शास्त्रों में विभिन्न पद्धतियाॅ का वर्णन देखने को मिलता है, इन सभी पद्धतियों के बीच अपने सुव्यवस्थित व प्रयोगात्मक ज्ञान के कारण योगदर्शन का अपना विशिष्ट स्थान है। प्रकृृति मे होने वाली घटनाओं को देखकर मनुष्य की बुद्धि आदिकाल से ही उसको जानने व समझने का प्रयास करती रही है, परन्तु समग्र रूप से कारणभूत सर्वोच्च सत्ता को न जानने के कारण मुख्यतः भौतिक प्रगति के क्षेत्र मे ही उन्नति दिखाई देती है, आाधारभूत समस्या की ओर मानव कुछ विशेष अनुसंधान नही कर पाता है, साधारण चिंतन व विशेष विषयपरक अध्ययन के माध्यम से उस सर्वोच्च सत्ता को जानना दुर्लभ है, हमें आवश्यकता है, कि हम अपने चेतना को वह उध्र्वगति प्रदान करें, जिसके माध्यम से हम उस सर्वव्यापी सर्वोच्च सत्ता को जान सकें, इसी मूलभूत समस्या ने भारतीय व पाश्चात्य विचारधारा को दर्शन के रूप विकसित किया और आज अधिकाशं मतानुयायी ईश्वर की सर्वोच्च सत्ता को प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से स्वीकार भी करते है, कुछ अपवाद भी है। सामान्य रूप से प्रत्येक दार्शनिक चितंन प्रणाली में सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति के लिये हम विभिन्न सैद्धान्तिक व्याख्याओं को तो बहुतायात में देखते है, पर इन दार्शनिक विवेचनाओं के बीच प्रयोगात्मक धारा कही ओझल सी हो जाती है, योगदर्शन उसी आभाव को पूर्ण करने साथ ही अपने सुव्यवस्थित व प्रयोगात्मक ज्ञान के कारण दार्शनिक परम्पराओं में एक केन्द्रीभूत तत्व के रूप में विद्यमान हो जाता है, सर्वोच्च लक्ष्य की प्राप्ति हेतू योगदर्शन उस ईश्वर के स्वरूप की व उसकी प्राप्ति में सहायक मार्गो की स्पष्ट रूप से व्याख्या करता है,तथा उस परम तत्व की साधना मे प्रासागिंकता का भी वर्णन करता है।
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Pages:140-142
How to cite this article:
सचिन भारद्वाज, गणेश शंकर गिरी "योग दर्शन में ईश्वर का स्थानः एक साधन या साध्य ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 3, 2021, Pages 140-142
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