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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
हिंदी उपन्यासों में सिसकता भारतीय कृषक-जीवन
Authors
श्री कृष्ण कुमार शर्मा
Abstract
मुझे अच्छी तरह से याद है कि बचपन में हम सभी को यही पढ़ाया और सिखाया जाता रहा है कि “हमारा देश एक कृषि प्रधान देश है |” निश्चित रूप से भारत एक कृषि प्रधान देश है | आज के युग में हम अपने चारों ओर देखें तो खुद के बचपन से अब तक के जीवन में समाज, विचार, परिस्थितियाँ सभी कुछ बदल गई हैं | यदि नहीं बदली तो देश के अन्नदाता किसान की स्थिति और उनका शोषण | हाँ इतना जरूर हुआ है कि आज के किसान के शोषक कोई जमीदार या साहूकार कम ही होते हैं | आधुनिकीकरण और औधोगिकीकरण के नए रूप की चकाचौंध और कुछ मजबूरियों ने किसान जीवन को पूरी तरह से नए शोषकों और नई समस्यों के आधीन कर दिया है | आज का किसान अनेकों संघर्षों से रोज ही दो-चार हो रहा है | देश के विभिन्न राज्यों से किसानों के आत्महत्यों की खबरें आती है ज्यादातर इन आत्महत्याओं के पीछे कर्ज का ही दुष्चक्र रहता है | आज महाजन और जमीदार बदल गए हैं उनकी जगह बैकों तथा स्थानीय पूँजीपतियों ने ले लिया हैं | आज के परिवेश में कहीं किसानों की जमीने विकास के नाम पर छीनी जा रही हैं तो कहीं पर बीज और खाद के लिए घूसखोरी के रूप में उनका शोषण हो रहा है | अगर इन सब से ऊपर उठकर यदि किसान कठिन मेहनत करके फसल तैयार करते हैं और उसे बाजारों में बेचना चाहते हैं तो बाजारवादी व्यवस्था, सरकारी नीतियाँ यह सब किसानों के लिए बहुत ही कष्टदायक सिद्ध हो रही हैं | विडम्बना यह है कि देश का अन्नदाता किसान स्वयं आज भूखा है |
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Pages:52-56
How to cite this article:
श्री कृष्ण कुमार शर्मा "हिंदी उपन्यासों में सिसकता भारतीय कृषक-जीवन ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 52-56
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