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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
मथुरादत्त मठपाल का शब्द सामर्थ्य
Authors
कृष्ण चन्द्र, डॉ. गिरीश चन्द्र पन्त
Abstract
ज्ञातव्य है कि लोक बोलियाँ श्रुति और स्मृति परम्परा से ही जीवित रही हैं। इनकी कोई लेखन लिपि नहीं होती ऐसा जरूर हुआ कि उनके संरक्षण के नाम पर लेखन और परिनिष्ठतीकरण आरम्भ हुआ। परम्परागत रूप से मौखिक रहने वाली इन बोलियों की अपनी धरोहर है। इनकी विशिष्ट ध्वन्यात्मकता या उच्चारण क्षमता। लोककवि मथुरादत्त मठपाल की कविता में लोक बोली कुमाउनी के सभी गुण विद्यमान हैं।
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Pages:38-41
How to cite this article:
कृष्ण चन्द्र, डॉ. गिरीश चन्द्र पन्त "मथुरादत्त मठपाल का शब्द सामर्थ्य ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 38-41
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