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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
समुद्री मात्स्यिकी: विनियमन एवं संधारणीय अनुशीलन के परिपेक्ष्य में
Authors
डॉ सुभाष भिमराव दोंदे
Abstract
समुद्री मत्स्य संसाधन सीमित होने के कारण समाप्त भी हो सकते हैं, इसलिए समुद्री मछलियों का उन्मूलन होने से पूर्व इस क्षेत्र का विनियमन एवं संधारणीय प्रबंधन यह वक़्त की माँग है। इसी संदर्भ में अत्यधिक मछली पकड़ने के साथ साथ अवैध, गैर-सूचित और अविनियमित ढंग से मछली पकड़ने और मछली पकड़ने की विनाशकारी प्रथाओं को समाप्त करने की आज नितांत आवश्यकता है। समुद्री जैव-विविधता के सरंक्षण एवं संवर्धन बिना मछलियों की निरंतर 'अधिकतम संवहनीय उपज' नामुमकिन है। इसके अलावा बढ़ते समुद्री प्रदूषण, भूमण्डलीय तापक्रम वृद्धि, पादप प्लवकों की न्यूनता, महासागर अम्लीकरण, एल-निनो और आवर्ती चक्रवात की बढ़ती घटनाओं के कारण समुद्री मात्स्यकी गहरे संकट में है। मान्सून के दौरान मछली पकड़ने पर राष्ट्रीय प्रतिबंध के साथ साथ जालों के छिद्रों के व्यास पर नियंत्रण और बॉटम ट्रॉलिंग जैसी विनाशकारी प्रथाओं पर पूर्ण रूप से प्रतिबंध जितना जरूरी है उतनी ही हानिकारक सब्सिडी को समाप्त करना भी क्योंकि ईंधन, जाली और यांत्रिक नौयान पर सब्सिडी 'पारिस्थितिक संवहनीयता' के दृष्टिकोण से सबसे विनाशकारी सब्सिडी मानी गयी है। इसके बदले मछुआरों को व्यापार और व्यवसाय में सब्सिडी देने से 'पारिस्थितिक लागत' के बिना सबसे बड़ा लाभ मिल सकता है और यह एक ही समय में पारंपरिक मछुआरों और समुद्री पारिस्थितिक तंत्र दोनों के लिए एक जैसी जीत की स्थिति हो सकती है। न्यूनतम विकसित तटीय समुदायों को आर्थिक लाभ बढ़ाना और छोटे पैमाने के मछुआरों तक पहुंच प्रदान करना यह एसडीजी 14 लक्ष्य के ऐसे प्रमुख उप-लक्ष्य है, जिन्हें समुद्री मात्स्यिकी या तटीय विनियमन से संबंधित राष्ट्रीय नीति या अधिनियम में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। पारंपरिक मछुआरों को 'आंतरिक जल' के तटीय संसाधनों के साथ 12 समुद्री मिल तक फैले हुए 'अधीनस्थ क्षेत्रिक समुद्र' के संसाधनों पर प्राथमिक एवं सामुदायिक अधिकार प्रदान करने के लिए वन अधिकार अधिनियम 2006 समकक्ष कोई अधिनियम पारित होना चाहिए। प्रस्तुत लेख में समुद्री मत्स्यकी विनियमन एवं संधारणीय अनुशीलन की मौजूदा दशा और दिशा का समालोचनात्मक विवरण है।
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Pages:42-48
How to cite this article:
डॉ सुभाष भिमराव दोंदे "समुद्री मात्स्यिकी: विनियमन एवं संधारणीय अनुशीलन के परिपेक्ष्य में ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 42-48
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