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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 7, ISSUE 4 (2021)
मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास साहित्य की विशेषताँए
Authors
डॉ. तबस्सुम खान, स्मित अवस्थी
Abstract
मनुष्य जाति ने जब अपने जीवन और समुदाय का व्यवस्थित करने की कोशिश की तो इस कोशिश के परिणाम स्वरूप समाज का निर्माण हुआ। यद्यपि समाज की परिभाषा के संबंध में विभिन्न विचार और मत है किन्तु मोटे रूप में समाज जीवन और जीवनशैली, जीवन पद्धति, समुदाय और महत्वाकांक्षाओं को सुव्यवस्थित, क्रमबद्ध करने तथा उसे दिशा और आकार देने के लिये निर्मित किया गया। मनुष्य समाज को माने या न माने, रहना उसे समाज में ही पड़ता है। इसी समाज का आत्मकथा विधा से प्रगाढ़ संबंध है। बिना समाज को समझे हम आत्मकथा विधा नहीं समझ सकते है। समाज में नर-नारी को उनकी क्षमताओं तथा शक्तियों के आधार पर कार्य दिया गया। दोनों को समान अधिकार व दर्जा दिया गया। प्रकृति ने दोनों के प्रति समान व्यवहार रखा किन्तु धीरे-धीरे नर नारी पर हावी होने लगा और यही से दोयम दर्जे का प्रारम्भ हुआ। समाज पुरूष प्रधान बनने लगा और स्त्री पुरूष के अधीन होने लगी। यही से स्त्री के जीवन में विसंगतियों का आगमन हुआ। यही विसंगतियां आत्मकथाओं में चित्रित होन लगी और महिला आत्मकथाओं का जन्म हुआ। आत्मकथा विधा का प्रारंभ कहां से होता हैं? यह भी देखना होगा। जब साहित्य का जन्म हुआ त बवह समुदाय की वीरता और वैभव को प्रदर्शित करने का माध्यम रही। धीरे-धीरे जब तमाम कलाओं की तरह साहित्य ने भी सूक्ष्मता की ओर बढ़ाना शुरू किया तो ‘‘मनोदशा’’ और ‘‘मन की बात’’ साहित्य में स्थान लेेने लगा। साहित्य मन का आईना बन गया जिसमें वो सब कुछ दिखाने लगा जो किसी विज्ञान, यंत्र, उपकरण या एक्स-रे मशीन से नहीं देखे जा सकते थे जिसकी शुरूआत शक्ति से हुई। ईश्वर के प्रति ‘‘मन के भाव’’ प्रदर्शित होने लगा। फिर श्रृंगार का समय आया तो ‘‘मनोवृत्तियां’’ साहित्य का स्थान पाने लगी। फिर समय ‘‘मनोविकारों’’ का आया और तमाम पुराने-नये विचार साहित्य का विषय बनने लगे। फिर समय विचारणीय बिन्दु का आया और तमाम विचारक सामने आये। सबसे महत्वपूर्ण समय ‘‘मनोदशाओं’’ का आया और मन की दशायें जो जीवन, समाज, परम्पराओं, निराशाओं, प्रेम में असफलता से जन्मी थी साहित्य की आच्छादित करने लगी। यही आच्छादान आत्मकथाओं के बीज बिन्दु है। मेरे विचार से आत्मकथा विधा को दिशा छायावाद से मिली है, क्योंकि आत्मकथाओं (खास तौर पर महिलाओं की) में जीवन विसंगतियों से उपजी परिस्थितियों और स्थितियों का जैसा वर्णन किया है। कुछ-कुछ ऐसे ही सर्वप्रथम हिन्दी साहित्य में सर्वप्रथम छायावाद में सामने आया है। महादेवी, निराला का जीवन संघर्ष ही उनका साहित्य बना है।
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Pages:136-138
How to cite this article:
डॉ. तबस्सुम खान, स्मित अवस्थी "मैत्रेयी पुष्पा के उपन्यास साहित्य की विशेषताँए ". International Journal of Hindi Research, Vol 7, Issue 4, 2021, Pages 136-138
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