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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 1 (2022)
स्त्री-शोषण की व्यथा-कथाः गुलकी बन्नो
Authors
डॉ. सुनीता मिश्रा
Abstract
सभी जानते हैं कि स्त्री-पुरूष समाज रूपी सिक्के के दो पहलू हैं और ये एक दूसरे के पूरक है। किसी एक का अभाव में दूसरे के अस्तित्व पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है। उसके बाद भी पुरुषों ने समाज में महिलाओं को अपने बराबर का दर्जा नहीं दिया अर्थात समानता से वंचित रखा। यह स्थिति समाज में बहुत पहले से ही देखने को मिलती है। आदिकाल से ही नारियों की दशा दयनीय एवं सोचनीय रही है। उसकी दशा एक वस्तु की तरह रही है,जब चाहा इस्तेमाल किया और जब चाहा निकाल बाहर किया या शोषण की चक्की में पीस डाला। स्त्रियों की इसी दशा को देखकर विवेकानंद कहते है - ष्स्त्रियों की अवस्था को सुधारे बिना जगत के कल्याण की कोई सम्भावना नहीं है। पक्षी के लिए एक पंख से उड़ना सम्भव नहीं है।ष्1 इस तरह विवेकानंद जी महिला समाज की वास्तविक दशा से चिंचित हो, देश एवं समाज की भलाई को महिला समाज की तरक्की के बगैर असंभव बताया है।
श्गुलकी बन्नोंश् कहानी स्त्री-शोषण की इसी व्यथा-कथा की सच्चाई को व्यक्त करती है । इसकी मूल संवेदना स्त्री शोषण से गुजरती हुई स्त्री मुक्ति से होकर पुनः उसकी विवशता भरी नारकीय जिंदगी की ओर लौट जाती है क्योंकि इस समाज में पुरुषों से अधिक स्त्री ही हमस्त्री का शोषण कर उसे उसकी जिंदगी से समझौता करने पर विवश करती हैं । श्गुलकी बन्नोश् कहानी श्बन्द गली का आखिरी मकानश् की प्रथम कहानी है। इसमें लेखक ने परित्यक्त स्त्री का उपेक्षा भरा जीवन जीने के लिए विवश गुलकी का मायके लौट आने व रिश्तेदारों एवं समाज में मिली हिकारत को सहने और घेघा बुआ तथा निरमल की माँ जैसी स्वार्थी लालची स्त्रियों द्वारा सताए जाने, उसकी बेसहारा और निराश्रित स्थिति को देखकर उसे सशक्त बनाने के लिए सत्ती द्वारा अपने घर में आश्रय देने और फिर लालची घेघा बुआ व निरमल की माँ के षड्यंत्र का शिकार बन पति के बुलाने पर उससे भी बदतर जिंदगी बिताने के लिए वापस पति के साथ चले जाने का चित्रण किया गया है। लेखक ने इस कहानी में श्गुलकीश् के माध्यम से परित्यक्त स्त्री के जीवन को चित्रित किया है।
गुलकी अपने पिता की अकेली सन्तान है और बाद में पिता की मृत्यु भी हो जाती है। वह संघर्षमय जीवन बिताती है। अपने पति के साथ पांच वर्ष रहने के बाद, पति उसका परित्याग कर देता है। क्योंकि वह एक मृत्य शिशु को जन्म देती है। गुलकी पति द्वारा प्रताड़ित होती है। उसका पति उसे सीढ़ी पर से धकेल देता है, जिसके कारण वह जिन्दगी भर के लिए कुबड़ी हो जाती है और पति का घर भी छोड़ना पड़ता है। अंत में असहाय लाचार होकर गुलकी वापस पति के साथ अत्यंत नारकीय जीवन जीने का समझौता कर लौटती है ।
लेखक ने कहानी में परित्यक्त स्त्री के साथ कटु व छलपूर्ण व्यवहार करनेवाले लोगों का चित्रण भी किया है। समाज में लोग अकेली स्त्री को घृणा की दृष्टि से तो देखते ही हैं, इसके साथ ही उसकी संपति हथिया कर उसका अपमान भी करते हैं। अकेली स्त्री की आजीविका कमाने में मदद करने की आड़ में जो कुछ उसका है उसे लेने का प्रपंच रचते हैं। ड्राइवर बाबू, निरमल की माँ तथा घेघा बुआ के माध्यम से लेखक ने ऐसे ही कपटी व्यक्तियों का चित्रण किया है, जो सहायता करनेवाले व्यक्ति का मुखौटा लगाकर लोगों की संपति हथियाने के इरादे रखते हैं। घेघा बुआ ऐसी ही स्त्री है जो पहले तो गुलकी को शरण देती है पैसे के लालच में। परन्तु जब गुलकी की दुकान नहीं चल पाती और वह बुआ को किराया नहीं दे पायी । तब घेघा बुआ उसे चौतरे से निकाल देती है। वह उसका अपमान करती है और उसकी दुकान को भी बर्बाद कर देती है।
लेखक ने इस कहानी के माध्यम से कुबडे व्यक्ति का समाज द्वारा मज़ाक उड़ाने का चित्रण भी किया है। गुलकी जब वापिस अपने मायके आती है तो मुहल्ले के बच्चे उसे बहुत तंग करते हैं। वे गुलकी को कभी कुबड दिखाने के लिए कहते है तो कभी उसे चिढ़ाते हुए कहते - ष्कुबड़ी - कुबड़ी का हेरानाष्। एक बार तो मेवा ने उसकी पीठ पर धूल फेंकी और सब बच्चों ने मिलकर उसे बुरी तरह पीटा भी। इस दयनीय स्थिति के बीच भी वह यही समझती है- ष्हमारा भाग ही खोटा हैष्। 2 वह चुपचाप सबकी बातें सुनती और अपने भाग्य को कोसती ।
लेखक ने कहानी में सत्ती के माध्यम से एक सशक्त स्त्री का चित्रण किया है जो निस्वार्थ भाव से औरों की मदद करती है। पति व समाज द्वारा दुत्कारे जाने के पश्चात सत्ती गुलकी को अपने घर में पनाह देती है और उसे अन्याय के खिलाफ लड़ने को भी कहती है। उसे बुरे लोगों का साथ न देकर उनके विपक्ष में खड़े होने के लिए समझाती है । अन्त में जब उसका पति उसे दोबारा लेने आता है तो वह उसे जूते लगाने को कहती परन्तु गुलकी उसकी यह बात नहीं मानती है और पति के साथ जाने को कहती है। गुलकी सत्ती से कहती है कि ष्अपनी सगी बहन क्या करेगी जो सत्ती ने किया हमारे लिए।ष् 3 
लेखक ने गुलकी के साध्यम से एक ऐसी पारंपरिक सोच वाली स्त्री का चित्रण किया है जो शारीरिक व आर्थिक रूप से असमर्थ होने के कारण अन्याय को अपना भाग्य समझ कर अपनाती है और पति द्वारा प्रताड़ित होने के उपरान्त भी पति को नहीं छोड़ना चाहती है चाहे पति जीवन भर उसे कष्ट क्यों न दे।
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Pages:54-56
How to cite this article:
डॉ. सुनीता मिश्रा "स्त्री-शोषण की व्यथा-कथाः गुलकी बन्नो". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 1, 2022, Pages 54-56
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