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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
प्रेमचंद साहित्य में भारतीय किसान की स्थिति
Authors
Balakrishna
Abstract
बीसवीं सदी के दूसरे तीसरे दशक में देश की औपनिवेशिक व्यवस्था में किसानों की जो दशा थी, आज़ादी के उनहत्तर साल बाद क्या हालत है, यह हमें रोज अखबार और टीवी से पता चल रहा है। मीडिया पर आज के दौर में पूँजीपति या औद्योगिक घरानों के भारी नियंत्रण के बाद भी पिछले पंद्रह सालों में देश के तीन लाख से भी अधिक किसान आत्महत्या कर चुके हैं और आज भी उन्हे कोई राहत नहीं है, भले ही कोई हज़ार करोड़ मुआवजे बाँटे गए हैं। किसानों की आत्महत्या या देश का कृषि संकट देश की भ्रष्ट व्यवस्था के कारण आज भी कम होने की बजाय निरंतर बढ़ रहा है। इसका प्रभाव साहित्य के क्षेत्र पर भी पड़ा। हिन्दी साहित्य के उच्चकोटि के रचनाकार प्रेमचंद समाज के इस यथार्थ से अत्यधिक विचलित हुए, जिसका प्रभाव उनकी रचनाओं पर भी पडा। किसान जीवन की जितनी गहरी, प्रामाणिक और वास्तविक समझ प्रेमचंद के यहाँ जैसी थी, वैसी समझ हमें किसी और कथाकार के पास दिखाई नहीं पड़ती। किसानों के जीवन की त्रासदी को उन्होनें जैसे खुद तिल-तिल कर महसूस किया था, वैसा ही अपने कथा साहित्य में उतारा।
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Pages:15-17
How to cite this article:
Balakrishna "प्रेमचंद साहित्य में भारतीय किसान की स्थिति". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 15-17
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