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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
कृषक संस्कृति समाज और विमर्श
Authors
शिव प्रकाश त्रिपाठी
Abstract
मनुष्य सभ्यता के विकास क्रम में सबसे पहले खेती करना प्रारंभ करता है । यही कृषि कर्म आगे चलकर एक नई संस्कृत को जन्म देती है, जिसे हम कृषक संस्कृति कहते हैं। इसने हमारे जीवन को एक नई दिशा दी। हमने जीवन को सुगम, सार्थक और सफल बनाने के क्रम में नित नए प्रयोग किए। जिसने खेती-किसानी को और ज्यादा समुन्नत किया । किंतु कालांतर में ऐसी व्यवस्था ने जन्म लिया जिनकी वजह से यह वर्ग जो आम जनमानस के लिए अन्नदाता था, निरंतर उपेक्षित होता चला गया । औद्योगिकरण के दौर में जब हमें तकनीकी के माध्यम से कृषि क्षेत्र में अत्यधिक विकास और समुन्नत तकनीकी के प्रयोग से उच्चतम उत्पादन करना चाहिए था, उस दौर में हमने इस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया और इसे उपेक्षित ही छोड़ दिया। किसान जीवन के महत्व को साहित्य ने हमेशा केंद्रीय स्थान दिया। भक्तिकालीन कवि कविताओं में जब भी जन समस्याओं पर अपने विचार रखे तो उनमें केंद्रीय तत्व के रूप में खेती-किसानी अनिवार्य रूप से उपस्थित रहता था। आधुनिक भारत में हमारी व्यवस्था और व्यवस्थापक निरंतर इस क्षेत्र के प्रति उदासीन रहे। जिसका प्रतिफल यह हुआ कि खेती भगवान् भरोसे होती गयी और किसान आत्महत्या तक करने को मजबूर हो गया। साहित्य में भी इसको विमर्श के रूप में जनमानस के बीच नहीं रख पाया। जो भी प्रयास हुए वो जन चेतना को लाने के लिए नाकाफ़ी रहे। जिससे दिनों-दिन खेती-किसानी बदतर होती चली गई। आज यह दशा है कि नई पीढ़ी इस क्षेत्र में बिल्कुल भी नहीं आना चाहती जो एक कृषि प्रधान देश के लिए बिल्कुल भी सकारात्मक नहीं है इससे पहले की देश का एक बहुत बड़ा वर्ग जिसकी अपनी संस्कृति है, वह संकुचित होता चला जाए, हमें इस पर गहन चिंतन करना होगा। कृषि विमर्श को केंद्र में रखना होगा । आम जनमानस के बीच चर्चाएं करनी होंगी और बेहतरी के लिए व्यवस्थापकों पर दबाव बनाना होगा तभी संभव है कि हम इस वर्ग को बचा सके।
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Pages:23-25
How to cite this article:
शिव प्रकाश त्रिपाठी "कृषक संस्कृति समाज और विमर्श". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 23-25
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