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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
दिनकर के काव्य में राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्र की पृष्ठभुमि
Authors
ज्ञानेन्द्र दुबे
Abstract
इस शोध पत्र का मूल उद्देष्य दिनकर की राष्ट्रीय भावना को विस्तृत जानने के लिए कि गयी है। दरअसल जिन दिनों दिनकर जी का काव्य क्षेत्र में प्रवेष हुआ। तब हिन्दी कविता की दो धाराएँ स्पष्ट रूप से प्रवाहित हो रही थी। एक धारा छायावादी काव्य की थी। जिस पर यह आक्षेप था कि वह वास्तविकता से कोषों दूर हैं तथा दूसरी धारा राष्ट्रीय कविताओं की थी जो वास्तविकता के अत्यधिक करीब होने के कारण कला की सूक्ष्म तरंगों को अपनाने में असमर्थ सी दिखती थी। पिता श्री रविसिंह एवं जननी मनरुपदेवी के द्वितीय पुत्र दिनकर एक छोटे परिवार में जन्म लेकर भी अपने ज्ञान के प्रकाश से निरंतर दैदीष्यमान होकर वह छोटी कुटिया तक सीमित न रहे बल्कि वह उसकी प्रतिभा को युगों तक निखारने में सक्षम हुए हैं। अल्पायु में पिता की छत्रछाया इनके ऊपर से दूर होने के बाद यह हारे नहीं बल्कि भरपूर भावुकत एवं हिम्मत के साथ अपने कार्य पथ पर चलते रहे। राष्ट्रीयता, जातीय, सद्भावना, उत्साह कर्मठता आदि इनके भीतर बहुत ही भरपूर मात्रा में श्रीवृद्धि हुए हैं। उनकी कविता के राष्ट्रीय सांस्कृतिक स्वर ने ऐसी गूँज पैदा की जो उस युग के स्थापित काव्य-स्वर से सर्वथा भिन्न होने पर भी सहृदय मे मन-प्राण को बाँधने वाली थी। किन्तु अज्ञेय पौरूष के धनी दिनकर ने कला को वास्तविकता के समीप ला दिया। दिनकर जी ने शक्ति और सौंदर्य का मणिकांचन संयोग है। युग की व्यथा-कथा को गंुजित करने वाली कविता राष्ट्रीयता के स्तर पर दिनकर ने लिखी थी।
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Pages:57-59
How to cite this article:
ज्ञानेन्द्र दुबे "दिनकर के काव्य में राष्ट्र निर्माण एवं राष्ट्र की पृष्ठभुमि". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 57-59
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