ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 2 (2022)
लघुकथाओं में बिखरा हास्य एवं व्यंग्य
Authors
गौरव शर्मा
Abstract
वैसे तो व्यंग्य अपने आप में स्वतंत्र विधा रही है जो कि सामाजिक, राजनीतिक बदलाव के कारण बदलते मानव व्यवहार को उजागर करने के लिए काम में ली जाती है परंतु रचनाकार कहानियों, कविताओं, लघुकथाओं, उपन्यासों आदि में व्यंग्य का प्रयोग कर जीवन में आई समस्या को एक दम से उभारकर पाठक के सामने लाता है ताकि सहृदय उसको अपनी समस्या जान उसके समाधान में जुट जाये। हरिशंकर परसाई जी ने तो हास्य एवं व्यंग्य को स्वतंत्र रूप से लिखा है। उन्होंने सत्ता और समाज में फैली बुराइयों पर हास्य और व्यंग्य को माध्यम बनाकर तीखा प्रहार किया है। जो व्यंग्य मानवीय कुंठाओं और भावनाओं पर किये जाते हैं वे अधिक स्थायी और प्रभावी होते हैं। लघुकथाओं में भी इसी गहरी मानवीय संवेदना का परिचय देकर समाज के विभिन्न भागों में पल रही कुंठाओं को बेनकाब किया गया है और व्यक्ति का सत्य से साक्षात्कार करवाया है। साहित्य में हास्य को फूहड़ता का विषय मन जाता रहा है परंतु हास्य में व्यंग्य को मिलाकर लघुकथाकारों ने इसे सार्थक एवं यथार्थ बना दिया है। व्यंग्य में कथ्य की अपेक्षा प्रस्तुति का महत्व अधिक होता है। व्यंग्यकार का एक-एक शब्द ऐसा धारदार होता है जो कि सीधे पाठक के हृदय पर आघात करता है किंतु जब उसे हास्य से जोड़ दिया जाता है तब वह चुटीला और प्रिय बन जाता है। हास्य-व्यंग्य एक मीठी छुरी के समान है जो बड़ी सरलता से मन में छिपी सच्चाई को बाहरी आवरण भेदकर प्रकट कर देता है।
Download
Pages:51-53
How to cite this article:
गौरव शर्मा "लघुकथाओं में बिखरा हास्य एवं व्यंग्य". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 2, 2022, Pages 51-53
Download Author Certificate
Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.

