Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 8, ISSUE 3 (2022)
जनधर्मी काव्य के प्रणेता एवं राजनीतिक विद्रोह के प्रचारक ‘‘नागार्जुन’’
Authors
संतोष साहू, वंदना त्रिपाठी
Abstract
नागार्जुन के काव्य में प्रतिरोध का स्वर सबसे असरदार उनके व्यंग्य में है। भारत की गरीबी के जिम्मेदार ब्रिटेन को माने और जब ब्रिटेन के साथ भारत के नेताओं का मैत्री और सम्मान का भाव नागार्जुन देखते हैं तो उनके मन में आक्रोश स्वाभाविक है। एक बार विजय बहादुर सिंह ने उनसे पूछा कि बाबा आप कविता कब लिखते है? बाबा ने कहा ‘‘कविताएँ, जब गुस्सा आता है तब लिखता हूँ और तब बहुत मूड में होता हूँ, फिर पूछा-गुस्सा किस पर ? बाबा बोले-समाज या व्यवस्था पर। वे सामंतवादी व्यवस्था के मार्ग में अवरोध डालते हैं। उसके विरुद्ध आम जन को जागरुक करते हैं।
Download
Pages:59-62
How to cite this article:
संतोष साहू, वंदना त्रिपाठी "जनधर्मी काव्य के प्रणेता एवं राजनीतिक विद्रोह के प्रचारक ‘‘नागार्जुन’’". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 3, 2022, Pages 59-62
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.