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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
लोक साहित्य एवं वैज्ञानिकताः एक अनुशीलन
Authors
राजेश कुमार वर्मा, रेखा पाण्डेय
Abstract
भारतीय साहित्य में समग्र के रूप में ‘लोक’ शब्द का प्रयोग समाज के उस मानव समूह हेतु किया जाता है जो वास्तव में बाह्य दिखावा, शिक्षा और सभ्यता इत्यादि से सुदूर आदिम युग की मनोवृत्तियों से युक्त होता है। इस तरह सभ्यता के वैदिक काल से वर्तमान तक लोक शब्द का प्रचलन मुख्यतः समान अर्थों में सतत् रूप में प्राप्त होता है। लेकिन यहां प्रमुख रूप से दृष्टव्य यह है कि लोक शब्द का प्रयोग लोक संग्रह अथवा लोक कल्याण के सन्दर्भों में किया गया है। साहित्य के क्षेत्र में साहित्य शब्द के पहले लोक अभिधान लगाने के पश्चात् उसका तात्पर्य होता है- लोक का साहित्य। यहाँ पर लोक शब्द का आशय जन-मानस सम्प्रदाय/समूह द्वारा लिया जाता है। अतः लोक साहित्य का ज्ञान ऐसे साहित्य से होता है जिसकी सारगर्भित रचना जनता-जनार्दन के माध्यम से की जाती है। लोक साहित्य का संबंध समाज-विज्ञानों में अत्यन्त ही घनिष्ठ है। मानव समुदाय का अध्ययन करने वाले सम्पूर्ण समाज-विज्ञानों के अध्ययन की व्यापक स्तर पर सामग्री लोक साहित्य में उपलब्ध हो जाती है। इस दृष्टि से लोक-साहित्य एवं समाज-विज्ञानों का आपसी संबंध अत्यन्त ही प्रगाढ़ माना जाता है। अतः कुछ शास्त्रों, कलाओं अथवा समाज-विज्ञानों से लोक साहित्य एवं वैज्ञानिकता का जिक्र यहां किया गया है।
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Pages:1-3
How to cite this article:
राजेश कुमार वर्मा, रेखा पाण्डेय "लोक साहित्य एवं वैज्ञानिकताः एक अनुशीलन". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 1-3
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