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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में योग सूत्र की सार्थकताः स्वामी विवेकानन्द का चिन्तन
Authors
प्रवेश जाटव, गणेश शंकर
Abstract
हर एक व्यक्ति वर्तमान में तकनीकी और भौतिकता के दलदल में फंसकर अपने वास्तविक स्वरूप को भूल गया है। बड़ती हुई आधुनिकता, सांसारिक सुख सुविधायें तथा साधनों की बढ़ोत्तरी ने व्यक्ति को इतना अंधा बना दिया है कि उसके वास्तविक स्वभाव पर संशय प्रतीत होने लगता है। मनुष्य इस जंजाल में इतना फंस गया है कि वह स्वयं के लिए ही युद्ध कर रहा है और फिर विलाप करता रहता है। आज व्यक्ति ने भले ही स्वयं को सुख साधनों से परिपूर्ण कर लिया हो, परंतु उसे सोने अर्थात निद्रा के लिए दवाओं की आवश्यकता पड़ने लगती है। व्यक्ति को इस संसार का सामना करने के लिए अत्याधिक ऊर्जा की आवश्यकता होती है और इस ऊर्जा को प्राप्त करने के लिए मनुष्य कई प्रकार की दवायें ले रहा है, जिनसे उसका शरीर तथा मन पूर्ण रूप से शिथिल हो गया है। इन सभी को दूर करने के लिए, एक व्यवस्थित जीवन जीने के लिए व्यक्ति संजीवनी की तलाश में है। जो उसे समस्त प्रकार के तनाव, अवसाद से दूर कर एक अच्छे और व्यवस्थित जीवन जीने की शक्ति और कला प्रदान करे। योग ही वह संजीवनी है जिसके द्वारा मनुष्य तनाव और अवसाद के बन्धन से मुक्ति पा सकता है। वर्तमान समय में व्यवस्थित जीवन जीने व एक दिनचर्या को बनाये रखने की अत्यधिक आवश्यकता है। इस योग को व्यवस्थित रूप से जनमानस के उपयोग हेतु बनाने का कार्य महर्षि पतंजलि ने योगसूत्र के द्वारा इस समाज को दिया। इसी योग सूत्र को सरल एवं व्यवहारिकता देने व प्रत्येक मनुष्य का जीवन सरल बनाने का महत्वपूर्ण कार्य स्वामी विवेकानन्द ने किया।
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Pages:7-10
How to cite this article:
प्रवेश जाटव, गणेश शंकर "व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन के परिप्रेक्ष्य में योग सूत्र की सार्थकताः स्वामी विवेकानन्द का चिन्तन". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 7-10
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