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VOL. 8, ISSUE 4 (2022)
हिन्दी काव्य में बिम्ब के सशक्त हस्ताक्षर-डाॅ॰ केदारनाथ सिंह
Authors
प्रवीन भारद्वाज, मौसमी परिहार
Abstract
काव्य साहित्य में ‘बिम्ब’ अंग्रेजी के ‘इमेज’ शब्द का पर्याय माना जाता है जो पश्चिम में अंग्रेजी कवि टी.ई.ह्यूम के द्वारा एक काव्यान्दोलन के रूप में स्थापित हुआ और बिम्बवाद की इस नवीन अवधारणा से प्रभावित हो कर इंग्लैण्ड और अमेरिका के कतिपय कवियों यथा ऐमी लाॅवेल, एज़रा पाउण्ड और रिचर्ड एल्ंिडगटन इत्यादि ने बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में ‘बिम्बवाद’ के सिद्धान्तों को अपनाया और उनका प्रतिपादन किया। यूँ तो हमारे प्राचीन साहित्य में, विशेषकर संस्कृत साहित्य में भी प्रतीकों और बिम्बों का प्रचुर उपयोग होता रहा है किन्तु इसे काव्य की ‘आत्मा’ या ‘प्राण’ के रूप में स्वतन्त्रता के कुछ वर्ष पूर्व और बाद में छायावादी कवियों ने अपनाया और इसके चित्रत्व को स्वीकार किया। वैसे तो ‘बिम्ब’ का हिन्दी में प्रयोग सर्वप्रथम आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने किया और माना कि ‘काव्य में अर्थग्रहण मात्र से काम नहीं चलता, बिम्ब ग्रहण अपेक्षित होता है’, किन्तु डाॅ. केदारनाथ सिंह ने बिम्ब को काव्य के मूल्यांकन हेतु एक विशिष्ट मापदण्ड के रूप में न केवल स्थापित किया अपितु अपने आरंभिक काव्य संग्रहों यथा ‘तीसरा सप्तक (1959) अभी बिल्कुल अभी (1960) जमीन पक रही है (1980) इत्यादि में बिम्ब-विधान का सार्थक एवम् सफल प्रयोग किया। बिम्ब-विधान पर सर्वप्रथम विस्तृत और सुव्यवस्थित रूप से अध्ययन करने का श्रेय उनकीे पुस्तक ‘आधुनिक हिन्दी कविता में बिम्ब-विधान‘ (1971) को जाता है। डाॅ॰ केदारनाथ सिंह हिन्दी काव्य में बिम्ब को स्थापित और वैज्ञानिक ढंग से प्रयोग करने वाले सशक्त हस्ताक्षरों में अग्रगण्य हैं
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Pages:17-20
How to cite this article:
प्रवीन भारद्वाज, मौसमी परिहार "हिन्दी काव्य में बिम्ब के सशक्त हस्ताक्षर-डाॅ॰ केदारनाथ सिंह". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 4, 2022, Pages 17-20
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