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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 6 (2022)
स्वयं की खोजः योग
Authors
डॉ० सोनिया
Abstract
मानव हमेशा से ही सुख, शांति व आनंद की खोज में लगा रहा है। भौतिक विकास और वैभवता व्यक्ति का "जीने का स्तर" उठाते हैं, जबकि आतंरिक आध्यात्मिक पुनर्वास व्यक्ति का "मूल जीवन स्तर"। भौतिक वैभवता एक व्यक्ति को तब तक सुख की अनुभूति नहीं करवा सकती है, जब तक कि व्यक्ति के आतंरिक व्यक्तित्व में निखर न आ जाये। आध्यात्म के मार्ग से यह निखार संभव है। परन्तु भौतिक एवं सांसारिक संपदाओं की चाह ने मानवी मूल्यों का हनन किया है। इन सभी विकास के मार्गों के दौरान मानव ये भूल गया है कि स्वास्थ्य सबसे अधिक महत्व का विषय है। स्वस्थ व स्फूर्त रहने के लिये मानव कई प्रकार की क्रियाओं को करता है। कई प्रकार के खेलों व क्रीडाओं के द्वारा भी व्यक्ति स्वस्थ रह सकता है। उनमे से एक है - योग। वेदांत के मतानुसार - "जीव और आत्मा के मिलन की संज्ञा ही योग है।" महात्मा 'महर्षि' याज्ञवल्क्य ने भी इसी बात की पुष्टि की है। योग से मानव के समस्त शारीरिक ही नहीं बल्कि मानसिक रोगों व द्वेषों का भी समाधान संभव है। व्यावहारिक रूप से योग की शुरुआत तब से ही हो गयी थी जब से मानव रूपी जीव ने अपने अस्तित्व को पहचाना था। और यहीं से व्यक्ति ने योग के मार्ग पर चलते हुए स्वयं को खोजना शुरू किया। योग वशिष्ट के अनुसार - "संसार-सागर से पार होने की युक्ति को ही योग कहते हैं।" ये ऐसी मानसिक एवं शारीरिक प्रशिक्षण विधि है, जो कि योगासनों, स्वास सम्बंधित व्यायामों, ध्यान, मुद्रा आदि सम्बंधित रहते हुए एक व्यक्ति को शान्त चित करते हुए सच्चाई का बोध करवा पाने में सक्षम है। योगी रामचरक के शब्दों में "हम सभी अनंत शक्ति के स्वामी है और इस शक्ति के रहस्य से परिचित कराने की कला योग विज्ञान में निहित है।"
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Pages:1-2
How to cite this article:
डॉ० सोनिया "स्वयं की खोजः योग". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 6, 2022, Pages 1-2
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