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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 8, ISSUE 6 (2022)
डार से बिछुड़ीः नारी अस्मिता का दुर्लभ सत्य
Authors
कंचन सिंह
Abstract
साहित्य में स्त्री-विमर्श को उत्तर आधुनिकता का परिणाम माना जाता है। सामान्यतया स्त्री-विमर्श का अभिप्राय केवल स्त्री की मुक्ति या पुरुष की बराबरी से लिया जाता है परन्तु इसके विपरीत यह शब्द अत्यन्त गहन अर्थ रखता है और नारी मुक्ति के साथ-साथ नारी अस्मिता, चेतना व स्वाभिमान को भी स्वयं में समाविष्ट किये हुए है। समाज की आधी आबादी होने के बावजूद भी स्त्री अपना मनोचित सम्मान प्राप्त कर सकने में असमर्थ रही है। उसे सदैव ही अपने स्त्रीत्व की कीमत चुकानी पड़ी है। जीवन के हर पड़ाव पर उसे एक नया संघर्ष मिला और चुपचाप सह जाना ही उसकी नियति बन गयी। आज भले ही नारी हर क्षेत्र में अपनी सशक्त उपस्थिति दर्ज करा रही है परन्तु आज भी न जाने कितनी बार उसे अपनी अस्मिता से समझौता करना पड़ता है। कृष्णा सोबती के साहित्य में भी स्त्री-अस्मिता का सशक्त चित्रण मिलता है। इसी क्रम में उनका उपन्यास ‘‘डार से बिछुड़ी’’ भी उनकी रचनाशीलता का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसके अन्तर्गत वे नारी की सहज-सुलभ मनोकामनाओं के साथ उसकी अस्मिता के दुर्लभ सत्य को सहजता से उजागर करती हैं। प्रस्तुत उपन्यास ‘‘डार से बिछुड़ी’’ में सोबती जी नारी-अस्मिता का प्रश्न उठाते हुए, अपने कथ्य से यही दर्शाना चाहती है कि स्त्री, जीवनयापन हेतु दूसरों पर निर्भर क्यों हैं ? आखिर स्त्री स्वयं का जीवन दूसरों के लिए क्यूँ जीती है? यह उसकी स्वेच्छा है अथवा विवशता? वह क्यूँ अपने सपनों को, अपनी महत्वाकांक्षाओं को, नारी मन की सहज कल्पनाओं को साकार रूप देने में असमर्थ है ? क्या बस इसी कारण, क्यूँ कि वह एक स्त्री है ? यही प्रश्न सम्पूर्ण उपन्यास में हमारे मन को कचोटते रहते हैं।
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Pages:3-5
How to cite this article:
कंचन सिंह "डार से बिछुड़ीः नारी अस्मिता का दुर्लभ सत्य". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 6, 2022, Pages 3-5
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