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VOL. 8, ISSUE 6 (2022)
ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में निहित दलित प्रतिरोध का स्वरूप
Authors
सदानंद वर्मा
Abstract
ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में जहां एक और दलित जीवन के अनुभव तथा जिजीविषा की यथार्थ झलक देखने को मिलती है तो वहीं दूसरी ओर अपने स्व से टकराते एवं बचकर निकल जाने की चेष्टा करते कुछ पात्र भी दिखाई पड़ते हैं। उनकी कहानियों में समाज का घिनौना चरित्र, सामाजिक विद्रूपता, अमानवीय प्रवृत्तियों के साथ-साथ शोषण व साजिशों का एक भयावह जाल दिखाई पड़ता है जिसमें उलझा दलित समाज एक ओर तो उन साजिशों से स्वयं को मुक्त करने के लिए नए-नए रास्तों की पड़ताल करता हुआ दिखाई पड़ता है; वहीं दूसरी ओर उस समाज में अपनी पहचान बनाने एवं अपने अधिकारों को प्राप्त करने हेतु निरन्तर संघर्षरत्त दिखाई पड़ता है। यही कारण है कि जहाँ वह एक ओर अपने अधिकारों को प्राप्त करने के लिए सामाजिक व्यवस्था व उसमें व्याप्त रूढियों, पाखंडों के खिलाफ़ विरोध व प्रतिरोध का स्वर बुलंद करता हुआ नजर आता है तो वहीँ दूसरी ओर उसमें आत्मसम्मान, प्रतिष्ठा, गौरव आदि पाने की तीव्र आकांक्षा भी देखने को मिलता है।
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Pages:25-29
How to cite this article:
सदानंद वर्मा "ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानियों में निहित दलित प्रतिरोध का स्वरूप". International Journal of Hindi Research, Vol 8, Issue 6, 2022, Pages 25-29
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