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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 1 (2023)
कृष्ण भक्ति परम्परा व अष्टछाप कवि
Authors
सुनील कुमार पण्ड्या, मंजू चतुर्वेदी
Abstract
कृष्ण भक्ति और अष्टछाप कवियों की परंपरा भारतीय संस्कृति में भक्ति और काव्य के समृद्ध विरासत का उदाहरण है। भक्ति की यात्रा, जैसा कि प्राचीन ग्रंथों में वर्णित है, दक्षिण भारत में शुरू हुई और विभिन्न क्षेत्रों में फली-फूली, अंततः वृंदावन में अपने चरम पर पहुंची। चार प्रमुख वैष्णव आचार्यकृरामानुजाचार्य, निम्बार्काचार्य, माध्वाचार्य, और विष्णुस्वामीकृने कृष्ण भक्ति के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस परंपरा से प्रभावित प्रमुख कवियों में जयदेव थे, जिन्होंने ‘‘गीत गोविंद‘‘ की रचना की, और विद्यापति, जिनके कार्यों ने कई लोगों को प्रेरित किया, जिसमें चौतन्य महाप्रभु और वल्लभाचार्य शामिल हैं। वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्ग संप्रदाय की स्थापना ने उत्तर भारत में कृष्ण भक्ति के प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दिया। अष्टछाप के कवि, वल्लभाचार्य और उनके पुत्र विठ्ठलनाथ के शिष्य, अपनी भक्तिपूर्ण रचनाओं के साथ इस परंपरा को समृद्ध किया। प्रमुख कवियों जैसे कुंभनदास, सूरदास, परमानंददास, और कृष्णदास ने अमर रचनाएं कीं जो कृष्ण की दिव्य लीला और भक्ति का उत्सव मनाती हैं। उनकी कविताएँ न केवल भक्ति के सिद्धांतों को मूर्त रूप देती हैं, बल्कि स्थानीय संस्कृति और भाषा में भी रची-बसी हैं, जिससे उनकी रचनाएं लोगों के दिलों में गहराई से प्रतिध्वनित होती हैं।
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Pages:48-51
How to cite this article:
सुनील कुमार पण्ड्या, मंजू चतुर्वेदी "कृष्ण भक्ति परम्परा व अष्टछाप कवि". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 1, 2023, Pages 48-51
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