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VOL. 9, ISSUE 3 (2023)
21वीं सदी की कहानीः संवेदना और स्वरूप
Authors
डॉ. रमेश कुमार गोहे
Abstract
लगातार बदलते समय के साथ ही मानव सभ्यता भी निरंतर बदल रही है। मानव सभ्यता की संस्कृति, समाज और सामाजिक दायरा बढ़ने के साथ-साथ ही व्यक्ति का सामाजिक चरित्र भी बदला है। उसकी सीमाओं का विस्तार हुआ है, पर साथ ही कई नई संकीर्णताओं ने भी जन्म लिया है। भौगोलिक सीमाओं को लांघते हुए हम विश्वग्राम की परिकल्पनाओं की दुनिया में विचरते हुए, सीमा विवादों में भी उलझे हैं। हम अपने ही देश के अंदर जाति, धर्म, वर्ण, वर्ग और प्रांतीय भेदभाव, जातीय अस्पृश्यता के भेदभावों से ग्रसित हैं। कोरोना जैसी महामारी में मानवीय मूल्यों की गिरावट और उसका चरित्र सामने आकर खड़ा हो गया है। बढ़ते क्रम में साहित्य की विभिन्न विधाओं में 21वीं सदी का समाज परिलक्षित हुआ है। गद्य की तमाम विधाओं के साथ-साथ ही कहानियों ने भी समाज का चरित्र उकेर कर सामने पेश किया है। इस आलेख का अभिधेयभी 21 वीं सदी का सामाजिक परिदृश्य और इस समय की प्रकाशित कहानियों में समाज का अवलोकन करना है। कहानीकारों के लेखन में संवेदना और स्वरुप की दृष्टि से कहानियों की पड़ताल करते हुए मानव सभ्यता की दशा को देखना है और साथ ही उसकी दिशा तय करना है।
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Pages:16-18
How to cite this article:
डॉ. रमेश कुमार गोहे "21वीं सदी की कहानीः संवेदना और स्वरूप". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 3, 2023, Pages 16-18
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