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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
मुंशी प्रेमचंद और नारायण आपटे के उपन्यासों में चित्रित नारी जीवन के विविध आयाम
Authors
सायली सिद्धार्थ पवार
Abstract
बीसवीं सदी आधुनिक भारतीय साहित्य के उत्थान की सदी है। उन्नीसवीं सदी के पुनर्जागरण का आधार लेकर इस सदी के साहित्य में लगभग सभी विधाओं ने एक स्वर में मानवतावाद का नारा बुलंद किया। उपन्यास भारतीय साहित्य में उन्नीसवीं सदी के यथार्थवादी विधा के रूप में विकसित हुआ। भारतीय उपन्यास पहले महायुद्ध के आसपास परिपक्व होना शुरू हुआ। मुंशी प्रेमचंद इस विधा के प्रतिनिधि रचनाकार माने जाते हैं। 
जब भी साहित्य और सामाजिकता की बात होती है तब यही कहा जाता है कि इन सबकी शुरुआत यूरोप से हुई किंतु कई मायनो में मेरा मत इन सबसे कुछ अलग है। “उन्नीसवीं सदी में मुंबई में कार्नेलिया सोराबजी नामक पारसी लड़की ने बंबई विश्वविद्यालय से जब डिग्री प्राप्त की उस समय तक इंग्लैंड में कोई लड़की ग्रेजुएट नहीं थी।”१ और जब कार्नेलिया वकालत करने इंग्लैंड गई तो वहाँ पर वह एकलौती लड़की थी। फ्रांस में छठे दशक में नारी मुक्ति आंदोलन की शुरुआत हुई जबकि १८७२ में ही रखमाबाई ने अपनी स्वतंत्रता की आवाज़ बुलंद की थी। भारतीय उपन्यासों में स्वतंत्र चेतना की महिलाएँ आज़ादी के पहले ही अपने अधिकारों के लिए आवाज़ उठाने लगी थी। 
उन्नीसवीं सदी में ज्योतिबा और सावित्रीबाई फुले और महर्षि कर्वे जी के प्रखर नेतृत्व ने स्त्री स्वातंत्र्य और शिक्षा की नींव रखी। बीसवीं सदी के पूर्वार्ध में प्रेमचंद एक ऐसे रचनाकार थे जिनके नारी चरित्र परंपरा के चौखटों को तोड़कर बाहर निकलने की कोशिश करते दिखाई देते है। वहीं नारायण हरि आपटे जी के भी नारी पात्र परंपराओं की चौखटों को पार करते हुए मर्यादाओं को तोड़कर अपने अस्तित्व के लिए अपने परिवार और समाज से संघर्ष करती दिखाई देती हैं।

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Pages:53-55
How to cite this article:
सायली सिद्धार्थ पवार "मुंशी प्रेमचंद और नारायण आपटे के उपन्यासों में चित्रित नारी जीवन के विविध आयाम". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 53-55
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