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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
रामचरितमानस में स्त्री विमश
Authors
कृष्णा
Abstract
रामचरितमानस का कालखण्ड मध्यकालीन रहा है जब सामंतवाद चरम पर था और समाज में मूल्यों का पतन हो रहा था विशेष रूप से महिलाओं को लेकर अत्याचार बढ़ता जा रहा था। बाल विवाह, सती प्रथा, महिला अशिक्षा, कन्या भ्रूणहत्या आदि कुप्रथाओं का चलन भी बढ़ रहा था। इस समय तुलसीदास जी ने रामचरितमानस के माध्यम से स्त्रियों के विभिन्न स्वरूपों, उसके सामाजिक आदर्शों और अधिकारों का वर्णन किया। सामंतवादी और धर्मविरोधी लोगों ने उनकी कई चौपाइयों का गलत अर्थ लगाकर उन्हें दलित विरोधी और स्त्री विरोधी दर्शाने का प्रयास किया परंतु रामचरितमानस स्त्री विमर्श का अनूठा उदाहरण है जो कदाचित साहित्य में देखने को नहीं मिलता है। प्रस्तुत पत्र में रामचरितमानस में स्त्री विमर्श का विश्लेषण किया गया है, जिससे यह स्पष्ट होता है कि तुलसीदास जी स्त्रियों के विरोधी नहीं थे, वह तो नारी विमर्श के विभिन्न रूपों को विभिन्न पात्रों के माध्यम से सटीक रूप से प्रस्तुत कर रहे है।
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Pages:3-4
How to cite this article:
कृष्णा "रामचरितमानस में स्त्री विमश". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 3-4
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