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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
बदलते सम्बन्ध और प्रभा खेतान के उपन्यास
Authors
डॉ. स्वाति वर्मा
Abstract
हमारा समाज संबंधों को अपने अनुसार ही देखना चाहता है। मनुष्य से ही समाज बनता है एवं जहां दस तरह के मनुष्य होंगे, उनके विचारों में भी भिन्नता होगी इसलिए जो संबंध किन्हीं दो लोगों के लिए वैध है दूसरों की नजरों में अवैध। हम में से कोई भी इसका निश्चित समीकरण नहीं निकाल सकता क्योंकि हृदय से जुड़े संबंधों को दूसरों के सामने परिभाषित करना कई बार इतना कठिन हो जाता है कि उसकी अभिव्यक्ति मौन हो जाती है। कुछ ऐसी ही सच्ची कहानियों से रूबरू कराता है प्रभा जी का हर एक उपन्यास। रिश्तों की सही समझ, गहरी परख एवं संवेदना से परिपूर्ण एक-एक शब्द हमें सोचने-विचारने को बाध्य करते हैं। जब हम इन पात्रों के स्थान पर खड़े होते हैं, उनकी जिंदगी जीना शुरु करते हैं तब हम जान पाते हैं कि कैसे कोई सबकी नजरों में दोषी और स्वयं की निगाहों में निर्दोष और निश्छल होता है। उपभोक्तावादी समाज की यह सबसे बड़ी विडंबना है कि यहां सब कुछ बिकता है। सबका एक निश्चित मूल्य है। जो चीजें मूल्य हीन हैं या जिन्हें आप गणित में नहीं बांट सकते, वह है- मानवीय संबंध, प्रेम, करुणा, दया, अपनापन, लगाव इन्हें पाने की लड़ाई ही तो भूमंडलीकृत समाज की लड़ाई है, जिन्हें बाजार मुहैया नहीं कराता है।
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Pages:21-24
How to cite this article:
डॉ. स्वाति वर्मा "बदलते सम्बन्ध और प्रभा खेतान के उपन्यास". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 21-24
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