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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
हिंदी आलोचना: आरंभिक चरण
Authors
भास्कर लाल कर्ण
Abstract
हन्दी साहित्य के इतिहास में जो काल हलचल और कोलाहल, अंतर्विरोधों और अंतर्द्वंदों के रूप में जाना जाता है उस काल में हिन्दी आलोचना के आगमन को उनकी जटिलताओं के साथ इस शोध आलेख में स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है। भारतेन्दु युग में तत्कालीन रचनाकारों का विधाओं के स्वरूप के प्रति स्पष्टता नहीं थी लेकिन उनका मंतव्य स्पष्ट था। जिसमें परंपरा के प्रति आसक्ति के साथ नवीनता और राष्ट्रीयता का आग्रह भी था। इसी द्वंद्वात्मक परिवेश और द्वंद्वात्मक रचना-प्रक्रिया में आधुनिक विधा के रूप में हिन्दी आलोचना अंकुरित हो सबके सम्मुख आता है। इस शोध आलेख में हिन्दी आलोचना के आरंभिक चरण के इन विविध पक्षों को और साहित्य की दुनिया में इसके योगदान को पाठकों के सामने बाँधने की कोशिश की गई है।
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Pages:46-49
How to cite this article:
भास्कर लाल कर्ण "हिंदी आलोचना: आरंभिक चरण". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 46-49
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