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International Journal of
Hindi Research
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VOL. 9, ISSUE 4 (2023)
मानुषता को खात है जात-पात का रोगः रैदास
Authors
गीता पांडेय
Abstract
संत रविदास ने सामाजिक उत्थान के उन माध्यमों का अनुसरण एवं अनुसंधान किया जो लोक कल्याण और मानवता के हित मेँ थे। इस विषय मेँ रामधारी सिंह दिनकर ने लिखा है- ‘उच्च-नीचता, छुआछूत, धार्मिक संघर्ष आदि का नाश करके उच्च विचारोँ से प्रेरित होकर आदर्श सामाजिक जीवन व्यतीत करना ही उनका लक्ष्य था।”1 संत रविदास ने समाज मेँ फैले वैषम्य को बहुत करीब से अनुभूत किया, वे अपनी वाणी के माध्यम से समाज कल्याण की भावना को व्यक्त किया है। मध्यकालीन भारतीय समाज अनेकानेक सामाजिक कुरीतियों में जकड़ा हुआ था, जिसमें जाति-भेद सबसे बड़ी कुरीति और विकृति के रूप में समाज में विद्यमान थी। इस कुरीति को दूर करने में उस काल के संत-कवियों की बहुत ही महत्तवपूर्ण भूमिका रही है। तत्कालीन संत कवि और समाज दोनों ही एक दूसरे के अभिन्न अंग रहे हैं। समाज के विभिन्न कोनों से ही संतों का आविर्भाव हुआ, समाज की नब्ज़ को भी संत-समाज ने ही भली भांति पहचाना। वास्तव में मनुष्य का मूल धर्म है- मानव धर्म। मानव धर्म की रक्षा का बीड़ा संतों ने उठाया, संत-समाज इस बात को भली भांति समझ चुका था कि जाति-व्यवस्था के सड़े दृगले, विषैले और खोखले वृक्ष को हटाए बिना समाज में समभाव और समरसता के वृक्ष नहीं लगाये जा सकते, संत रैदास ने यही कार्य तत्कालीन युग में किया, उन्होंने समाज के समक्ष जाति-व्यवस्था के दुष्परिणामों और दुष्प्रभावों से लोगों को अवगत कराया।
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Pages:50-52
How to cite this article:
गीता पांडेय "मानुषता को खात है जात-पात का रोगः रैदास". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 4, 2023, Pages 50-52
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