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VOL. 9, ISSUE 5 (2023)
सुशीला टाकभौरे के साहित्य में दलित समस्याएँ
Authors
रवीन्द्र कुमार
Abstract
प्राचीन काल से ही मनुष्य चार वर्णों में विभक्त था-ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र। पहले ये विभाजन कर्मों के आधार पर था, परन्तु बाद में ये जन्म के आधार पर जाना जाने लगा। शूद्रों का सदियों से ही भेदभाव का सामना करना पड़ रहा था जो कि मानवीय दृष्टिकोण से उचित नहीं था। आधुनिक दौर में शिक्षा में बढ़ते प्रचार-प्रसार के कारण कुछ दलितों के साथ सामाजिक समस्यओं में सुधार तो हुआ है पर कुछ जस की तस बनी हुई है। ग्रामीण क्षेत्रों की जस से तस बनी हुई समस्याओं से छुटकारा पाने के लिए अभी और समय लग जाएगा। सुशीला टाकभौरे द्वारा सदियों से चले आ रहे दलित उत्पीड़न और शोषण के खिलाफ लोगों को जगाने में सफलता प्राप्त की। ऊंच-नीच का भेदभाव, अस्पृश्यता,दलित नारी जीवन की विडम्बनाओं, अंधविष्वास, दलित वर्ग में व्याप्त भेदभाव, दलितों का आर्थिक शोषण,आवास की परेशानियां, दलितों पर होनें वाले अन्याय, अत्याचार कों अपनी लेखनी के मध्य में रखा। उन्होनें अपनी सास और ननद के अत्याचारों को बताकर ‘औरत ही औरत की दुश्मन होती है इस बात को सही साबित किया है। इसके अलावा यह भी बताया है कि स्त्री की स्थिति हमेशा समाज में दोयम दर्जे की ही रहती है।
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Pages:13-15
How to cite this article:
रवीन्द्र कुमार "सुशीला टाकभौरे के साहित्य में दलित समस्याएँ". International Journal of Hindi Research, Vol 9, Issue 5, 2023, Pages 13-15
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