Logo
International Journal of
Hindi Research
ARCHIVES
VOL. 10, ISSUE 1 (2024)
गेस्ट बना पिताः गिलिगडु
Authors
प्रीतिका एन
Abstract
वर्तमान समय में निरंतर बदलाव का नाम ही समाज है। इस प्रकार निरंतर बदलते समाज में हर किसी व्यक्ति, वस्तु आदि का स्थान भी बदल रहा है। जो कल तक उपयोगी एवं सम्माननीय थे, वहीं आज अनुपयोगी एवं तिरस्कार के पात्र बन गए हैं। इसी तिरस्कार एवं अनुपयोगिता  का दूसरा नाम है, वृद्ध समाज। जिन्हें हर क्षण अनुपयोगिता की कीमत चुकानी पड़ती है। इसी कशमकश, बेकारी, बदलते मूल्य, संस्कार व संस्कृति के कारण आज माता-पिता अवांछित से हो गए हैं। जिन्हें केवल बोझ समझ कर, छुटकारा पाने का प्रयास किया जाता है। आज बूढ़े माता-पिता अपने ही बच्चों के घर में पराए हो गए हैं। उनका मान सम्मान तो दूर, उनका होने न होने से भी किसी के  कोई फर्क नहीं पड़ता। ऐसी जटिल परिस्थितियों में माता-पिता गेस्ट बनते जा रहे हैं। जिनकी किसी को विशेष आवश्यकता नहीं है। इसी विषम सामाजिक यथार्थ की लेखकीय  अभिव्यक्ति से ओतप्रोत है, समकालीन उपन्यास। चित्रा मुद्गल का गिलिगडु इस दिशा में महत्वपूर्ण एवं विचारनीय उपन्यास है।
Download
Pages:8-9
How to cite this article:
प्रीतिका एन "गेस्ट बना पिताः गिलिगडु". International Journal of Hindi Research, Vol 10, Issue 1, 2024, Pages 8-9
Download Author Certificate

Please enter the email address corresponding to this article submission to download your certificate.